हम आप सभी किसी न किसी रूप में ईश्वर की पूजा करते हैं । किसी का मूर्ति में विश्वास तो किसी का निराकार शक्ति पर । कोई माता-पिता को ही ईश्वर मानते  हैं तो कोई दीनों – दुखियों की सेवा को ही ईश्वर की पूजा मानते हैं । किंतु यह निश्चय है कि प्रत्येक व्यक्ति उस supreme power  को मानते है। इस कारण यह भी विश्वास करते हैं कि वो हमारी प्रार्थना सुनता है। कई बार तो हम उससे सौदा भी कर लेते हैं कि मेरा काम कर दो मै तुम्हें प्रसाद चढाउंगा , या दर्शन करने, किसी विशेष मंदिर की मान्यता भी कर लेते हैं। कभी हमारी विनती स्वीकार हो जाती है तो कभी अस्वीकार भी होती है। इसका कारण मेरे अनुसार हमारे धैर्य और विश्वास की परीक्षा  है । इस सबंध में एक कथा याद आ रही है । एक बार भगवान कृष्ण भोजन कर रहे थे कि अचानक ही उठ कर दौडते हुए मुख्य द्वार से बाहर निकले किंतु तुरंत ही लौट आये । रुक्मणी ने पूछा प्रभु ! ये अचानक क्या हुआ ? भगवाने ने कहा कि मेरा एक भक्त इकतारा बजाता, मेरा ही गुणगान करता हुआ मुख्य सडक से जा रहा था । लोग उसे पागल समझ कर उस पर पत्थर फेंक रहे थे । उसके सिर से खून बह रहा था। बेचारा असहाय था। इस कारण मैं उसकी रक्षा हेतु दौड कर जा रहा था किंतु उसने इकतारे को सडक किनारे फेंक कर, हाथ में पत्थर उठा लिया । जब मैंने देखा कि वह स्वयं को ही सक्षम जानकर युद्ध के लिये तत्पर हो गया इसलिये अब उसे मेरी सहायता की आवश्यकता नहीं रही अत: मैं वापस आ गया ।  रुक्मणी ! मैं दुखी हूं कि मेरे भक्त को मुझ पर पूर्ण विश्वास नहीं है।

हमारी भी यही दशा है । हम कितनी ही पूजा करें किंतु एक छोटी सी परीक्षा में हम धैर्य नहीं रख पाते और हमारे विश्वास  पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है।

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