अभिलाषा

मैं  एक दिन कुछ shopping के लिए मॉल गयी| वहां मैंने एक छोटे बच्चे को देखा जो अपनी माँ के साथ आया हुआ था| मैं बड़े ध्यान से उस बच्चे को  observe कर रही थी कि तरह-तरह की चीजे देखता उठाता और माँ के खरीदे हुए सामानों के साथ रखता जाता कि  मुझे ये भी चाहिए, वो भी चाहिए| उसे इससे कोई मतलब नहीं कि वो चीजे मुझे दिलाने की इच्छा है या नहीं| न वह अपनी माँ से पूछता ही है कि माँ! मैं ये चीजें ले सकता हूँ? आपको अच्छी लगी मेरी चीजें?  billing कराते वक़्त माँ ने जो अपने पुत्र के लिए सही समझा सिर्फ उन्हें ही लिया और दूसरी चीजें छोड़ दीं |

इस दृश्य को देखकर मुझे दृष्टांत याद आ रहा है| एक महानुभाव एक प्रसंग सुनाया करते थे| एक बच्चा था, बड़े आराम से रहता था, एक दिन उसे ऐसा आभास हुआ परमात्मा उसके सामने हैं| उसने परमात्मा से कुछ प्रार्थना की कि — हे भगवान् मेरा बहुत बड़ा महल हो, झूले लगे हों, मेरे पास एक कार हो, सुन्दर व अच्छी height वाली पत्नी हो जो बहुत सुन्दर मीठा गाती हो, तीन स्वस्थ बेटे हों, मैं उनके साथ खूब आनंदपूर्वक खेलूँ फिर बाद मे वे बड़े-बड़े पदाधकारी बनें| मुझे इतना धन देना कि मुझे कुछ काम न करना पड़े| जब प्रार्थना पूरी हुई तो उसे ऐसा लगा जैसे भगवान् कह रहे हो बेटा बहुत अच्छा  सपना देख रहे हो| परन्तु वह तो यही कह रहा था कि मुझे please ये सब दे दो|

परमात्मा ने कहा—मैं चाहता हूँ कि तुम खुश रहो|

उसके बाद वह बड़ा हुआ| उसका accident हो गया, जिससे घुटने में दर्द हो गया| उसने एक business कर ली| शादी हुई ठिगनी पत्नी मिली, वह अच्छा गाने की जगह अच्छा खाना बनानेवाली मिली, इसी तरह तीन बेटों की जगह तीन बेटियाँ हो गयीं| इस प्रकार यहाँ सब होता रहा|

उसकी गृहस्थी तो ठीक चल रही थी परन्तु एक दिन अचानक उसे उस सपने की याद आ गई और वह बड़ा दुखी हो गया कि मैंने भगवान् से क्या माँगा था और उनने क्या दिया, मेरी इच्छानुसार मुझे तो कुछ भी नहीं मिला| बार-बार स्वप्न को याद करता और दुखी हो जाता यहाँ तक कि बीमार पड  गया, hospital में admit करवा  दिया गया| डॉक्टर ने बहुत समझाया कि  दुखी मत रहा करो| पर दुखी व्यक्ति किसी की सुनता कहाँ? बस एक ही चाह कि मेरा दुःख दूर हो जाये| जो भी मित्र आते उनसे यही दुखड़ा रोता रहता कि मैंने परमात्मा से  लम्बी पत्नी मांगी थी ठिगनी मिल गई, मित्रों ने समझाया कि पर वह सुन्दर तो है|

गाना अच्छा न गए तो क्या खाना अच्छा बनाती है तुम्हें तो संतुष्ट होना चाहिए, परन्तु उसे तो किसी की भी बात समझ में न आती| हालत दिन पर दिन गिरती गयी और बड़ी ही नाज़ुक हालत में पहुँच गया| उस समय उसे फिर आभास हुआ जैसे परमात्मा सामने खड़ा है| स्वाभाविक सी बात है कि उसने शिकायत की कि मैंने जो भी आपसे माँगा आपने मुझे नहीं दिया| परमात्मा ने कहा मैंने कहा था कि सपना अच्छा है, परन्तु मैंने इतनी चीजें तो दीं| परमात्मा बोले —तुमने अपनी बात तो बता दी लेकिन कभी यह भी सुना कि मैं क्या चाहता हूँ? तब कहीं उस आदमी को समझ में आया कि परमात्मा भी  मुझसे कुछ चाहते हैं| उसने पूछा आप क्या चाहते हैं ? परमात्मा बोले — मैं चाहता हूँ कि  मैंने जो कुछ तुम्हें दिया उसमे तुम खुश रहो| मेरा उद्देश्य केवल, मैं तुम्हें सुखी देखना चाहता हूँ| हे परमात्मा! तेरी मर्जी में ही मेरी मर्जी सोचकर जीने में ही जीवन का आनंद है|

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