जैसा कि हम जानते हैं हर मनुष्य में कोई न कोई ख़ास कला रहती है, और वह यह चाहता है कि उसकी कला की सभी प्रशंसा करें| इसमें किसी व्यक्ति का कोई दोष नहीं, यह तो मानव प्रकृति है| कोई नृत्य द्वारा तो कोई गीतों द्वारा(भजन, ग़ज़ल,संगीत) लेखों, प्रवचनों या भाषणों द्वारा अपने आपको अभिव्यक्त करते हैं| परन्तु बात यह है कि क्या आपकी अभिव्यक्ति हृदयस्पर्शी है? जब तक वे भाव हृदय से निकले हुए न हों, तो वे किसी के हृदय को छू ही नहीं सकते|
इसी बात पर मुझे एक घटना याद आ रही है| एक समय की बात है जब दीनदरवेश का मुशायरा चल रहा था| हज़ारों की संख्या में लोग उसका रस ले रहे थे| इससे कई लोग ईर्ष्या से जल रहे थे| ये लोग ऐसे थे, जिनके हृदय बड़े ही संकीर्ण थे| यही कारण था कि वे उसकी पवित्र और प्रभावपूर्ण वाणी के रहस्य को नहीं समझ पा रहे थे|
इस पर विद्वान् एवं कवि ‘कान’ जो गुजरात के थे संस्कृत के विद्वान् थे, से इनका शास्त्रार्थ कराया गया| ये लोगों की कुचाल थी, और शर्त यह थी कि जो भी हारे वह उनका शिष्य बनेगा| पाटली का ठाकुर वहां का सभापति बनाया गया| दीन दरवेश फिर ‘कान’ कवी ने कविता कहना आरम्भ किया|
दोनों ही कवि महान थे, श्रोता उसका रस लेने लगे| दोनों में एक न एक ऐसी विशेषता थी जो किसी को दूसरे से महान बताकर पृथक नहीं करने देती थी |
सात दिनों तक शास्त्रार्थ चलता रहा| सभापति भी कोई निर्णय न ले पा रहे थे| अंत में सभापति ने यह निर्णय लिया कि दोनों कवियों को एक समान पुरस्कार देकर बिदा कर दिया जाय| यह बात “कान” कवि के कानों तक पहुँची| इस बात से
उनके अभिमान को चोट पहुँची| उसने ठाकुर से इस निर्णय का कारण पू छा |
ठाकुर ने कहा—आप दोनों ही महान कवि एवं कलाकार हैं| संस्कृत का प्रकांड ज्ञान है, संस्कृत कवियों की विचार धारा ,भाव भंगिमा, और संस्कृत की गरिमा सब कुछ आप में मौजूद है, प्रतिभा की तो आपमें कमी है ही नहीं| परन्तु दीनदरवेश में वाणी की मधुरता है ,भावों की सरलता है, सबसे बड़ी बात तो यह है इनका प्रस्तुती करण बहुत ही प्रभाव शाली है |अपने मालिक के प्रति अनन्य निष्ठा एवं दीनता है, और यही वह चीज़ है जो सारी रचनाओं में जादू डालने का काम कर रही है, और मेरे मन को अभिभूत कर दिया है, और मैं भाव विभोर हो गया हूँ| आपकी रचनाओं में इनका अभाव है| यही कारण है कि आपकी कविता को दरवेश की कविताओं के समक्ष नहीं रखा जा सकता है |यही मेरे निर्णय का आधार है |
बस यही बात है कि कला सबके पास होते हुए भी कोई-कोई ही उसे अच्छे से अभिव्यक्त कर सकता है सभी नहीं| जिसकी अभिव्यक्ति के कारण कोई व्यक्ति अधिक से अधिक लोगों के मन पर राज्य कर सके वही सबसे अच्छा कलाकार|

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