एक दिन एक विद्यार्थी जो गर्मी की छुट्टियाँ बिताने मेरे घर आया हुआ था चूँकि मैं उसकी बुआ होने के साथ – साथ एक शिक्षिका भी हूँ तो उसके मन में जो-जो प्रश्न उठते उनको पूछा करता| एक दिन उसने पूछा कि अनुशासित होने का क्या तात्पर्य है? सभी यही कहते हैं कि जीवन में अनुशासन का बड़ा महत्व है| मैं इसका शाब्दिक अर्थ तो जानता हूँ पर,कृपया यह मुझे समझाएं|

तुमने सही कहा यह अनुशासन कोई अलग से किसी के पास जाकर सीखने की विद्या नहीं है यह तो बच्चा अपने आप ही सीखता जाता है |वास्तव में हमारे जीवन में इसका बड़ा ही महत्व है| घर, विद्यालय, समाज,सेना, देश, इन सबकी उन्नति अनुशासन पर ही आश्रित है|

कहा गया है कि परिवार ही बालक की प्रारंभिक पाठ शाला है, और सबसे प्रथम शिक्षिका माँ है और उसके पश्चात् परिवार है| यदि कोई बालक अच्छे सुसंस्कृत शिक्षित,संस्कारी परिवार का होगा तो उसे बचपन से ही अनुशासित  जीवन की आदत पड  जाएगी| वह कैसे पूछने  पर मैंने बताया—याद है तुम्हें! जब तुम नर्सरी में  पढ़ते थे, तुम्हारे स्कूल से आते ही माँ तुम्हारा bag खोलकर देखती थी कि  तुम गलती से किसी की पेंसिल रबर आदि ले तो नहीं आये? अर्थात् कोई बुरी आदत न पड जाये क्योंकि आज जो गलती  छोटी है, कल वही बड़ी बन जाती है| हर दिन सुबह जल्दी जगाना,समय पर बस स्टॉप पर छोड़ना, बराबर समय पर रिसीव करना, इन सबसे तुम तो अनजाने ही इतनी छोटी सी उम्र में ही (discipline) अनुशासन में आ गए|माँ ही सिखाती है कि उठते ही पहले ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़ना, स्नान के बाद फिर छोटी सी सही प्रार्थना करना, भोजन के पूर्व व सोने से पूर्व ईश्वर को याद करना| ये सब अब तुम्हारे जीवन के अंग बन गए और  तुम्हारा जीवन अनुशासित हो गया|

अनुशासन का अर्थ सिर्फ यही नहीं कि हम bus-stop पर कतार में लगें अपना नंबर आने तक इंतज़ार करें बल्कि self discipline में रहें जैसे किसी शिक्षक के आते ही, या किसी बड़े के आते ही उनके सम्मान में खड़े हो जाना, उन्हें बैठने के लिए आग्रह करना इत्यादि | यह सब बाह्य अनुशासन हुआ।

आंतरिक अनुशासन के लिये-दूषित वृत्तियों से अपने आप को बचाना होगा । हम किसी की तकलीफ का कारण न बनें । यहाँ तक कि बोलते समय  उचित – अनुचित का ध्यान रखकर ही  शब्दों का प्रयोग करें । यही  self discipline  कहलाता है| हमें सदा प्रयास करके इसे develop करते  रहना चाहिये  और साथ – साथ आत्म निरीक्षण भी करते ही रहना चाहिए कि मैं अनुशासित जीवन जी रहा हूँ या नहीं? मन  पर नियंत्रण करके और फिर इन्द्रियों पर नियंत्रण करके ही हम  भीतर  से अनुशासित हो सकते हैं, जिससे हमारे जीवन में समरसता, सरसता, सहृदयता जैसी चीज़ें आती हैं|जीवन में अनुशासित होने पर हमें स्वयं ही अहिंसा, सत्य जैसी चीज़ें अच्छी लगने लगती हैं और हम सहज ही समाज मे एक आदरणीय एवं सम्माननीय बन जाते है|वास्तव में यह उन्नति ही उत्तम है|

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