आजकल शहरों में colleges की कोई कमी नहीं है|  जहाँ  से  इंजीनियरिंग, मेडिकल, M.B.A. जैसे courses की degree हासिल की जा सकती है| इसी प्रकार एक शहर में एक बड़ा कॉलेज था, जहाँ एक sir थे, जो Neuro Science पढ़ाते थे, जिनका नाम आदित्य था|

अपने subject (विषय)पर उनकी बड़ी ही जबरदस्त पकड़ थी| “जैसा नाम वैसा काम” की तरह आदित्य बनकर शिक्षा क्षेत्र में बड़े ही नामी हुए| क्या अपने कॉलेज में क्या बाहर के कॉलेज में, सभी बड़ी ही तारीफ़ किया  करते  थे| लोग कहते थे कि neuro science पर इनकी टक्कर का कोई भी प्रोफेसर नहीं है| लोगों का विश्वास था कि जो भी इनसे पढ़ लेगा, उसके तो सारे concepts clear हो जायेंगे, साथ ही साथ exam  में pass होना भी सुनिश्चित है चाहे question paper कितना ही कठिन क्यों न हो|

उनकी इस ख्याति से principal बड़े खुश थे,क्योंकि उनके नाम के कारण college का भी बड़ा नाम हो रहा था|

इस पर उनके मन में एक बात आई कि क्यों न मैं भी अपने कॉन्सेप्ट्स इनसे क्लियर कर लूँ| और उनने professer साहब से कहा कि आप मुझे रोज एक घंटे पढ़ा दिया करें|

प्रिंसिपल साहब की बात उन्होंने मान ली और अगले दिन से पढाई शुरू हो गई| पढ़ते पढ़ते तीन-चार महीने बीत गए परन्तु उनके ज्ञान में कोई अंतर न आया| वे सोचने लगे कि इनके पढ़ाने में तो कोई कमी ही नहीं है, इसलिए वे बड़े परेशान थे, अपनी पत्नी से भी बोले—पता नहीं क्यों ऐसा लगता है कि पढाई और ज्ञान की गाडी जहाँ से शुरू की थी वो तो वहीं के वहीं है, कोई परिवर्तन नहीं आया |क्या कारण हो सकता है?  पत्नी बोलीं –आप सर से ही पूछलें   तो ठीक होगा|

ऐसा पूछे जाने पर सर ने जवाब दिया कि मैं कई दिनों से आपसे कुछ कहना चाहता था परन्तु संकोच वश कुछ न कह सका| principal साहब बोले अरे भई जो भी बात हो बिना संकोच के कहो | मैं कारण जानना चाहता हूँ|

Sir जिससे हम विद्या ले रहे हों उनके प्रति हमारे मन   में  श्रद्धा भाव का होना जरूरी है | इसके अलावा पढ़े हुए पाठ को बड़ी लगन से फिर revision भी करना होगा, एक भय मिश्रित भक्ति की आवश्यकता है कि  कहीं उनने पूछ लिया और मुझसे कुछ न बना तो? इस कारण से वह student सुनता भी बड़े ध्यान से|

मेरे मन में doubt था कि कहीं ऐसी समस्या न आये हमारे बीच| और ऐसा ही हुआ| कॉलेज में आप एक principal  और मैं एक professer | परन्तु,आप यहाँ principal ही रहें तो यह ज्ञान आप न ले पायेंगे और न मैं दे पाऊंगा|

यह सुनते ही principal को एहसास हुआ कि गलती कहाँ हो रही थी |

Comments to: बड़े पद का अहंकार सीखने नहीं देता

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