बिन मांगे मोती मिले

यह प्रकृति का नियम है कि किसी वस्तु को हम चाहेंगे, उसे पाने के लिए उसके पीछे पड जायेंगे, तो वह हमसे और दूर चली जाती है, इसके विपरीत, जब हम किसी वस्तु को अपने पास आने से रोकना चाहते हैं, तो वह और भी प्रबल वेग से हमारी ओर चली आएगी| मन में जैसे कोई बुरा ख्याल आया, जिससे हमें नफरत हो, वही हमारी तरफ खिंचकर आयेगी| जैसे कोई साधू स्त्रियों से दूर रहना चाहते हों, उनको स्त्रियाँ जा-जाकर घेर लेती हैं, जिस व्यक्ति को धन से प्रीति नहीं, उनके आगे लोग धन से भरी थैलियाँ पेश करने के लिए खड़े रहते हैं, और ऐसे ही कुछ ढोंगी लोग कंचन और कामिनी को चाहते हैं, तो उनके समीप कोई नहीं फटकता| एक उर्दू कवि की कविता का भावार्थ इस प्रकार है –जब तक हमें दुनियां की तलब थी तब तक वह हमसे भागती फिरती थी, और जब मैंने उससे नफरत करली तो, वह आने के लिए बेकरार है| अजब तेरी दुनियां अजब तेरा खेल, इससे अधिक क्या कह सकते हैं?
इसी पर आधारित एक दृष्टांत याद आ रहा है—
एक दरिद्र ब्राह्मण को धन की चाह थी| उसने लक्ष्मीजी की बहुत आराधना की| कठिन परिश्रम करने और कई वर्षों के गुज़र जाने पर भी उसे लक्ष्मीजी ने दर्शन ही नहीं दिए| वह लक्ष्मीजी पर बड़ा क्रोधित हो गया| जिससे उसका मन उनकी ओर से हट गया| अब वह बेचारा ब्राह्मण ऐसा हो गया कि न ही उसे धन चाहिए न ही लक्ष्मीजी के दर्शन ही|
एक दिन अचानक वह ब्राह्मण देखता क्या है कि, एक अति सुन्दर दिव्य तेज धारी स्त्री उनके सम्मुख खडी है, और कह रही है कि “माँग ले क्या माँगना चाहता है” ब्राह्मण ने पूछा– आप कौन हैं ? उत्तर मिला –मैं जगत का पालन करती हूँ| मैं तुझ से प्रसन्न हूँ और तुझे वर देने आई हूँ| जो इच्छा हो मांग ले|
ब्राह्मण ने चरण स्पर्श किये,साष्टांग दंडवत प्रणाम किया, फिर हाथ जोड़कर लक्ष्मीजी के सामने खडा हो गया| उसने क्या देखा! कि लक्ष्मीजी का सारा शरीर एकदम सुन्दर और गौर वर्ण का था, वे दिव्य तेज से दमक रहीं थीं परन्तु, उनके चरण और माथा दोनों ही काले हैं| वह आश्चर्य चकित हो पूछना चाह रहा था —माता! पहले आप मुझे मेरे प्रश्न का जवाब दें, उसके पश्चात मुझे जो कुछ माँगना हो माँग लूँगा|
ब्राह्मण ने कहा –माँ मेरा अपराध क्षमा कीजिये, मैं आपका पुत्र हूँ| पुत्र जिन बातों को नहीं जानता अपनी माता से ही पूछेगा न! मुझे इस वक़्त एक शंका हो रही है, और वह यह है कि आपका पूरा शरीर तो गौर है, फिर माथा और चरण काले क्यों हैं?
लक्ष्मीजी ने जवाब दिया—हे ब्राह्मण! मेरा ऐसा स्वभाव है कि जो कोई मुझे चाहता है, मैं उसके पास नहीं जाती| तब ऐसे लोग मेरे चरणों पर अपना सिर दिन रात रगड़ते हैं, इस रगड़ के कारण मेरे चरण काले पड गए हैं, और जो मुझे नहीं चाहते मैं उनके चरणों पर अपना माथा रगडती हूँ कि, किसी प्रकार वह मुझे धारण कर ले| इसीलिए मेरा माथा काला पड गया है|
ब्राह्मण कहने लगा —माँ मेरी शान्ति भंग न करो, मुझे क्षमा करो |आपका असली रूप मैंने देख लिया, मुझे अब कुछ भी नहीं चाहिए|
लक्ष्मीजी मुस्कुराकर लौट गयीं और ब्राह्मण अपने कार्य में लग गया|
एकदम इसी प्रकार जब हम चाहते हैं कि हम एकदम शांत हो जाएँ, हमारे अन्दर (मन में) कोई विचार न आये तो, पता नहीं कहाँ-कहाँ के विचार आने लगते हैं| हम खाली करने की कोशिश करते हैं और वे अन्दर भरते जाते हैं| क्योंकि जिन परमाणुओं से जो वस्तु तैयार होती है, उनका अंश उसमे आख़री तक रहता है| मन को शांत करने के चक्कर में, मन को मारना नहीं है, क्योंकि हम उन्नति मन के सहारे ही करते हैं|
हमें उन्नति तो करनी ही है परन्तु, किसी भी चीज के पीछे न पड़ते हुए|

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