दिए हुए वचन को निभाने का फल

दिए हुए वचन को निभाने का फल
यदि हमें यह विश्वास हो जाए कि दिए हुए वचन को निभाने की क्षमता हममे है, तो ही हमें किसी को वचन देना चाहिए, अन्यथा अगले व्यक्ति की दृष्टि में और हम अपनी खुद की दृष्टि में ही गिर जायेंगे| वचन निभाने का परिणाम भी बड़ा ही सुखद मिल सकता है| इसी बात पर मुझे एक कहानी याद आ रही है|
एक जंगल में एक तालाब था| कई जानवर वहां अपनी प्यास बुझाने आया करते थे| एक दिन एक शिकारी शिकार ढूंढते-ढूंढते वहां तक पहुँच गया| वहाँ उसे एक हिरण और हिरणी मिले| उन्हें देख वह शिकारी बड़ा खुश हुआ कि वाह! आज के अच्छे भोजन की व्यवस्था तो हो गई|
जैसे ही वह हिरण-हिरणी के करीब पहुंचा तो दोनों ने शिकारी से प्रार्थना की कि कृपा कर थोड़ी देर के लिए हमें छोड़ दें, क्योंकि हमारे बच्चे हमारा इंतज़ार कर रहे हैं| हमारे न पहुँचने पर वे परेशान होंगे, घबराएंगे| अत: हमारी बातों पर विश्वास कर हमें जाने दें| हम वचन देते हैं कि हम बच्चों को समझा बुझाकर लौट आयेंगे| पता नहीं कैसे बच्चों के बारे में सुनकर शिकारी का दिल भी पिघल गया बोला मैं आपकी बातों पर विश्वास कर आपको छोड़ रहा हूँ, आप भी अपना वचन निभाएं| मैं यहीं इंतज़ार कर रहा हूँ|
कुछ ही समय में हिरण हिरणी अपने बच्चों के पास पहुंचकर उनको समझाने लगे कि हमें अपना वचन निभाने के लिए जाना ही होगा |परन्तु तुम दोनों हमें वचन दो कि हमारे न रहने पर भी तुम लोग आपस में बड़े प्रेम से रहोगे और एक दूसरे का ध्यान भी रखोगे| परन्तु बच्चे अपने माता-पिता को छोड़ने को तैयार न थे, कहने लगे कि हम लोग भी आपके साथ ही चलेंगे| कितना ही समझाने पर, न मानने पर बच्चों को भी साथ ले जाना पड़ा|
अपने छोटे-छोटे प्यारे-प्यारे बच्चों को साथ लाया देख शिकारी बड़ा ही विस्मित रह गया,अरे! जानवर होकर भी वचन का इतना पक्का?
शिकारी ने हिरण- हिरणी से पूछा –अरे आप बच्चो को भी क्यों ले आये?
बताओ भला क्या करते? बच्चे हैं कि छोड़ने को तैयार न थे| पर हमें आपको दिया हुआ वचन निभाना भी जरूरी था| क्या करते अपना वचन निभाने के लिए हमें बच्चों सहित आना पड़ा|
इस घटना का बड़ा ही प्रभाव शिकारी पर पड़ा, और उसने सोचा – जानवर होते हुए भी वचन के इतने पक्के कि अपने वचन को पूरा करने के लिए बच्चों के न मानने पर तथा माता-पिता को न छोड़ने पर उन्हें भी शिकारी के पास ले आये? यह जानते हुए भी कि हम तो मारे ही जायेंगे साथ ही बच्चे भी?
और हाय! मैं कितना निकृष्ट जीव! कि ऐसे प्राणी को अपना भोजन बनाने को तैयार बैठा हूँ| मुझे तो खुद पर शर्म आती है|
बस आज , अभी से मैं प्रण करता हूँ कि जीव हत्या न करूंगा|
एक शिकारी का हृदय परिवर्तित कर दिया एक बेजुबान हिरण ने, वह भी अपने दिए हुए वचन को पूरा करके|
दिए गए वचन को निभानेका फल सुखदाई होता है|

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