दूसरों की मानसिकता का गलत निर्णय

अक्सर हम दूसरों  को Judge करते हैं और ये हमारी आदत बन गयी है। हमारी इस गंदी आदत के कारण हम कई बार दूसरों की मानसिकता का गलत निर्णय ले लेते हैं और सच्चाई जानने के बाद दुखी होते हैं । हम सब अत्यंत साधारण मनुष्य हैं, हम तो स्वयं को भी नहीं जानते फिर अन्य किसी को जानना तो और भी कठिन है। किंतु क्या करें आदत जो हमारी बन गयी कि एक छोटी सी बात पर ही हम दूसरों के विषय में, बिना पूरी बात जाने ही निर्णय ले लेते हैं। हमारा वो निर्णय सही हो सकता है किंतु गलत भी हो सकता है । एक ऐसी ही घटना याद आ रही है कि – एक व्यक्ति अपने परिवार के साथ दिल्ली घूमने गया । वो अत्यंत साधारण परिस्थिति का था इसलिये  सोचा कि इस visit को कम से कम पैसे में निपटाना है अत: अपने एक पुराने मित्र को फोन किया कि मै दिल्ली आया हूं तुम से मिलना चाहता हूं । उस मित्र ने अपना address दे दिया। ये महाशय अपनी पत्नि एवं तीन बच्चों के साथ अपने दोस्त के घर पहुंचे। दोस्त ने खुशी व्यक्त की और खाना भी खिलाया किंतु वह Tensed  था और बार- बार घडी देख रहा था । मेहमान भाई को लगा कि वह उसके आने से खुश नहीं है । फिर भी उसने अपने दोस्त से कहा कि मैं अपने परिवार को दिल्ली घुमाने लाया हूं  और 3-4 दिन तुम्हारे घर पर रुकना चाहता हूं । उस समय दिल्ली वाले का एक पडोसी भी वहां बैठा था । 3-4 दिन रुकने बात सुनकर उसने कहा यार ! तुम कोई धर्मशाला में रुक जाओ। यह जवाब सुनकर उन परिवार वालों का चेहरा उतर गया। यह देख कर साथ बैठे पडोसी मित्र ने कहा तुम लोग मेरे घर पर रुक जाओ मेरी Family  दस दिनों के लिये out of station है। परिवार वालों को मन चाही मुराद मिल गयी । वो लोग उस पडोसी मित्र के घर चले गये और कहने लगे कि दोस्त जानकर इसके घर आया था कि 3-4 दिन रुक जाऊंगा, इसका तो घर भी बडा है लेकिन क्या करें ! वक्त के साथ- साथ सब बदल जाते  हैं । भाई साहब ! आप कितने उदार हैं आपका हमारा कोई परिचय भी नहीं फिर भी आपने हमें दोस्त का दोस्त जानकर आश्रय दिया । अगले दिन दिल्ली वाले मित्र की पत्नी की मृत्यु हो गयी । शाम को परिवार वाले घूम कर लौटे तो उस घर के मालिक ने बताया कि आज तुम्हारे मित्र की पत्नी का देहांत हो गया । आश्चर्य ये था कि वह मृत्यु का कारण जाने बिना ही बोल पडे कि “ भगवान ने भी कितनी जल्दी उसे यह सजा दी ! उसने मुझे रुकने के लिये मना किया और भगवान ने उसकी पत्नी ही छीन ली । यह सुन कर उन भाई साहब के तेवर ही बदल गये और बोले कैसे आदमी हैं आप ? उसकी पत्नी को कैंसर था और वह जानता था कि वो तो बस एक – दो दिन की ही मेहमान है और इस कारण ही उसने आप लोगों को धर्मशाला में रुकने को कहा था । आप उसके मित्र होकर कितनी गंदी सोच रखते हैं । आप लोग अब मेरे घर पर नहीं रुक सकते कृपया अपना सामान उठाइये और इसी समय निकल जाइये ।

साधारणतया हम लोगों को तो अपना स्वार्थ ही दिखता है और हमारी आदत बन गयी है कि हम बिना सोच- विचार किये और बिना समय गंवाये दूसरों को जज करते हैं और फिर पछताते भी हैं । अपनी गंदी आदतों को छोडना और अपने आप को बदलना ही जीवन की नैतिक उन्नति है।

 

 

 

 

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