किसी को भी हम बड़ी ही आसानी से कोई भी वचन दे देते हैं कि आप बिलकुल चिंता न करें मैं हूँ न! अगला व्यक्ति उस वक़्त एकदम आश्वस्त हो जाता है कि अब कोई चिंता की बात नहीं अमुक व्यक्ति ने जिम्मेदारी ले ली है,अब मैं उस बात से निश्चिन्त हो गया हूँ|

परन्तु बात यह है किकोई भी व्यक्ति, ली हुई जिम्मेदारी के कार्य को करने की कुछ कोशिश करता है,परन्तु बाद में उसे वह कार्य भार-स्वरुप लगने लगता है, और वह व्यक्ति बिना किसी पूर्व सूचना के (information) ही उस कार्य को करना बंद कर देता है अर्थात् अपने दिए हुए वचन से मुकर जाता है|

बातें करते समय,वचन देते समय ऐसा कहते हैं कि मालिक! आपके लिए तो मेरी जान भी हाज़िर है, आप मुझे सेवा का मौका तो देकर देखें| इस प्रकार की बातें करते हैं परन्तु दिए हुए वचन को निभाना उनके वश की बात नहीं|

इसी बात पर मैं आपको दृष्टान्त बताना चाहूंगी|

एक पंडितजी थे| वे अच्छे पढ़े लिखे विद्वान् भी थे| नित्य प्रति नहा-धोकर सही समय पर पूजा में शरीक होते| एक दिन गुरु महाराज से कहने लगे कि मैं सुबह शाम ध्यान करता हूँ| मेरे अन्दर प्रसन्नता भी बढ़ती ही जा रही है|

यहाँ तक कि दूसरों के मन की बात भी जान लेता हूँ परन्तु, अब आगे क्या करूं? गुरु महाराज बोले –सब ठीक चल रहा है वैसे ही करते जाओ| कुछ दिनों बाद पंडितजी ने फिर से वही प्रश्न दोहराया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि ठीक है, पर वे संतुष्ट न हुए, परन्तु पूजा में बराबर आते ही रहे|

एक दिन गुरु महाराज ने पंडितजी से कहा –आपके मोहल्ले में एक धोबी रहता है| वह कुष्ट रोग से पीड़ित है| मैं स्वयं जाकर उसके घाव पर दवा लगा आता था परन्तु इन दिनों मेरा जाना नहीं हो पा रहा है| आप स्वयं घाव साफ़ कर मलहम लगा दिया करना|

पंडित जी बोले—अच्छा महाराज! जैसी आपकी आज्ञा |

पंडितजी उसके घर गए| बड़ा ही घिनौना घाव था| उनने सोचा यदि मैं अपने हाथ से साफ़ करता हूँ तो मुझे भी इसका छूत न लग जाए|

पड़ोस के एक निर्धन व्यक्ति को कुछ पैसे देकर यह कार्य पंडितजी ने उसे सौंप दिया|

एक दिन गुरु महाराज ने उनसे पूछा कि अब क्या हाल है उस व्यक्ति के घाव का? पंडितजी बोले –आप चिंता न करें महाराज! मैंने पक्की व्यवस्था कर दी है | इस पर गुरु महाराज बोले —तो क्या तुम स्वयं नहीं करते ?

पंडितजी बोले सबेरे से तो पूजा में आने की तैयारी करनी पड़ती है,फिर पैदल घर से चलना भी पड़ता है| समय पर पूजा में पहुंचना भी जरूरी है |

एक आदमी रख दिया है वह देख-भाल करता है|

गुरु महाराज ने कहा –आप साधना में आगे की बात करते हैं !

आत्मा तो आपसे कोसों दूर है|

जैसा की संस्कृत में कहा है –वचने किम दरिद्रता

अर्थात् बोलने में कैसी कंजूसी? ऐसा सोचकर लोग बड़े-बड़े वादे कर जाते हैं परन्तु उसे निभा नहीं पाते|

हमें हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जीवन में उन्नति करना हो तो कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए |

यदि वचन दिया है तो उसे किसी भी कीमत पर निभाना चाहिए |

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