अच्छा व्यवहार

एक दिन मैं मंदिर गई,वहां बड़ी ही भीड़ थी कारण ये था, सावन सोमवार था| लोग शंकर भगवान का अभिषेक करने के लिए खड़े थे| उस waiting time में मेरी निगाहें आस-पास के लोगों पर जा रही थी| अचानक एक जगह पर जाकर मेरी निगाहें टिक गयीं|

मैंने देखा कि एक व्यक्ति (बड़े अच्छे से) well -dressed था और car से उतरा, मंदिर में दर्शन के लिए आया था| उस आदमी को देखकर,एक बालक जो करीब आठ साल का होगा, दौड़कर उसके करीब आया| कहने लगा आप मुझे पैसे देदें, मैं भूखा हूँ कुछ खा लूँगा, कई बार बोलने पर भी ऐसे लग रहा था कि उसे कुछ सुनाई ही नहीं पड रहा हो| अब क्या करे बेचारा बच्चा छोटा तो था ही, उसने उस आदमी को हाथ लगा दिया| ओह! वह तो एकदम आग-बबूला ही हो गया| जोर –जोर से उस पर चिल्लाने लगा कि पता नहीं कहाँ से आ जाते हैं जीना हराम कर रखा ऐसे लोगों ने तो, वगैरह –वगैरह|
मेरे अलावा और भी कई लोग वहां जो खड़े थे, इस दृश्य को देख रहे थे | बुरा तो सभी को लग रहा था,परंतु बीच मे कौन बोले? इसलिए सब दृष्टा बने हुए थे| परन्तु एक नौजवान से ये व्यवहार सहन न हुआ| वह फुर्ती से आगे बढ़ा और उस बच्चे की बांह पकड़कर ले आया| बालक से बोला –बेटा! बोल क्या खायेगा? पास में थोड़ी ही दूरी पर पोहे का ठेला भी लगा हुआ और जलेबी भी| दोनों चीजें दिलवाकर ले आया और वापस मंदिर में वहीं आकर खड़ा हो गया|

उस अमीर को कुछ समझ में ही न आ रहा था कि क्या करूं? क्योंकि ऐसा हो गया जैसे किसी ने उसको सबके समक्ष झापड़ मार दिया हो!
वह अत्यंत चिडचिडा होकर बोलने लगा, ऐसे लोगों के कारण ही ऐसे भिखारियों की संख्या बढ़ती जा रही है| ऐसों की कभी भी मदद नहीं करनी चाहिए, वगैरह|
इस पर उस नौजवान ने जवाब दिया कि ये तो मुझे पता नहीं कि, अंदर जाकर, प्रसाद चढाने पर ,भगवान् इतना खुश होंगे या नहीं, और तुम इतने संतुष्ट हो पाओगे या नहीं, परन्तु मैंने इस बच्चे की आँखों में जो खुशी की चमक देखी है, उसने मुझे वह आनंद दे दिया शायद वह मुझे मंदिर में प्रसाद चढ़ाकर भी न मिले|
हम हर जीव में, हर प्राणी में, उसे देखें और सन्तुष्ट हों क्योंकि हर देश में तू, हर वेश में तू, तेरे नाम अनेक तू एक ही है|

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