मैं अपने बच्चों के साथ मॉल गई थी, वहां मैंने एक छोटे बच्चे को देखा,जो अपनी दादी से, एक खिलौने की shop पर demand किये जा रहा था,दादी प्लीज! मुझे ये दिलादो, फिर वो दिलादो,दादी है तो दिलाये ही जा रही है,हाथों में रखने की जगह नहीं,परन्तु पापा के मांगने पर भी उन्हें देना नहीं है| वाह रे भगवान् कैसी तेरी लीला! इतने छोटे से बच्चे से लेकर बड़े बूढ़े तक यही प्रवृत्ति सिर्फ ग्रहण! त्यागने की इच्छा ही नहीं|

जीवन के दो पहलू हैं,उन्हें यदि ठीक-ठीक समझ लें और निभाते चलें तो,कभी दुःख न आये—ग्रहण और त्याग

ये दिन और रात की तरह हैं,दिन में सब ग्रहण करें और रात में सब से अलग हो जाएँ,कुछ देर के लिए इसे भगवान् का समझें,उसका हिसाब उसे सौंप दें और चैन की नींद सोयें| यदि हम ग्रहण ही करते जाएँ और त्यागें न तो सिर पर कितना बोझ बढ़ जायेगा! जीवन में सुख ग्रहण करने ही में नहीं है, त्याग में तो उससे अधिक सुख है और अधिक आनंद भी|

इसी बात पर मुझे एक दृष्टान्त याद आ रहा है—एक महात्माजी कहीं से घूमते-घामते आ निकले|एक सेठ ने उनसे आग्रह किया कि आप मेरे यहाँ विश्राम कर लीजिये, जहाँ सुन्दर बगीचा, बड़ा सा कमरा, पढने के लिए अच्छी-अच्छी पुस्तकें, सारी सुख सुविधाएँ हैं| वे वहां ठहर गए|

उनका एक नियम था –सुबह उठकर घूमने जाते और काफी देर से लौटते| जब तक वे कमरे में रहते तो कमरा बंद रखते और बाहर जाते वक़्त दरवाज़ा खोल कर चले जाते| नौकरों ने यह बात सेठ को बताई| सेठ ने महात्माजी से ऐसा करने का कारण पूछा|

महात्माजी कहने लगे—ठीक तो है, जब तक इस कमरे में रहता हूँ,सब वस्तुओं को सम्हालता हूँ क्योंकि उनसे मुझे काम पड़ता है,लेकिन जब बाहर जाता हूँ तो खुला इसलिए छोड़ देता हूँ कि क्या पता लौटूँ या न लौटूँ?

मैं शरीर के बोझ को मन पर नहीं लादता| ऐसा करने पर मुझे चिंता नहीं सताती है, मैं एकदम निश्चिन्त रह पाता हूँ, और मुझे शांति भी मिलती है, और मुझे उस सर्वशक्तिमान पर भरोसा भी है कि जिसने आज मेरे ख्याल रखा है वह कल भी रखेगा, जो आज सब कुछ दे रहा है वह कल भी देगा| यही मेरा ग्रहण और त्याग है|

हम अपने जीवन के उद्देश्य को समझें, प्रत्येक वस्तु के संग्रह में और उसकी रक्षा में ही अपने जीवन का अमूल्य समय न खो दें|

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