धरती की छाती पर हम जब
कुछ दाने बिखरा दें तो वह
धन्य धन्य हो जाती है
उन नन्हे दानों के बदले
सोना वह उपजाती है
पर,
उसी छाती पर जब हम
पत्थर बिखराते हैं
चीर कलेजा कोमल उसका
सलाखों को सजाते हैं
तब वह सिसक सिसक कर हमसे
करती जाती मौन प्रार्थना
मत करना मुझको बेजान
उपजाना है मेरा काम
अपनी लालसा को दो विराम

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