हम  अपने बचपन से ही अपने course books की कविताओं के माध्यम से सुनते आ रहे हैं कि  फूलों से नित हँसना सीखो, भौरों से नित गाना, फल से लदी डालियों से नित सीखो शीश झुकाना इत्यादि| इसी प्रकार हमें सूर्य से भी सीखना है कि  किस प्रकार वह लगातार चौबीस घंटे कर्म में लगा रहता है और कभी थकता भी  नहीं| उसके कार्य में कोई विघ्न बाधा भी नहीं आती| सूर्य खुद तो कार्य करता है और हम से भी करवाता है| रात्रि  में हम सो जाते हैं, कर्म नहीं करते| सुबह होते ही सूर्य निकलता है, और हमें भी जगाता है कि उठो और काम करो|

कर्म हम सभी करते हैं| यदि हमारा कर्म ही हमारी पूजा हो जाए तो कितना बढ़िया हो? फिर तो हमें अलग से पूजा भी नहीं करनी पड़ेगी| हम कर्म करते रहें और पूजा होती रहे| अब प्रश्न यह उठता है किकर्म क्या है?  इसे कैसे करें? जिससे वह पूजा बन जाए? हमारी कर्मेन्द्रियाँ अर्थात् कर्म करने के लिए जो भी इन्द्रियाँ हैं वे सब तो मन के उपकरण हैं| मन का काम है कि इन उपकरणों से काम ले| मन अहम् के control में है, अधिकार में है यही कारण है कि मैं जो भी कार्य करूँ उसमे मेरा अहम् लग जाता है| इससे होता ये है कि कर्म का स्वरूप बदल जाता है, और मैं कर्ता  बन जाता हूँ, और कर्ता  बनने  से यह होता है कि उस कर्म का संस्कार बन जाता है| जिन संस्कारों को हमें भोगना पड़ता है, और मेरे दु:ख अशांति,क्लेश का कारण वही कर्म फल ही है|

प्रश्न यह उठता है कि इस कर्म को पूजा बनाने के लिए हमें क्या करना होगा? इसका तरीका हमें भी पता चल जाए तो हम भी कम से कम मेहनत में ज्यादा से ज्यादा कार्य भी कर पायेंगे और कार्य में भी कुशलता आएगी| मुझे कर्म करना है परन्तु जो भी कर्म करूँ उसमे मेरा अहम् न लगे, जिससे उसका संस्कार न बने ,यह अकर्म इतना आसान हो जाये कि  मेरा कर्म स्वतः ही रात दिन चलता रहे बिना किसी प्रयत्न के जैसे कार्य भी चल रहा है और वहां उससे जुड़े हुए भी हैं |

जैसे हम कार्य कर रहे हों या न कर रहे हों श्वास लेने की क्रिया तो लगातार चल ही रही है अर्थात कोई कार्य तो हम जानते हुए कर रहे हैं पर साथ ही साथ ऐसा कार्य भी चल रहा है, जिसके होने का  आभास भी हमें नहीं हो रहा है| परन्तु इस बात को सोचें तो हमें असंभव सा लगता है , परन्तु यह संभव है ,हम साँस लेते भी जा रहे हैं और छोड़ते भी जा रहे हैं और साथ ही साथ काम भी करते जा रहे हैं|

कार्यालय में बैठा हुआ एक क्लर्क पान चबाता जाता है उसके रस का आनंद भी लेता जाता है और अपना file work भी करता जाता है|

बस हमें सोचना यही है कि कर्म मैं नहीं कर रहा हूँ | सर्वशक्तिमान मेरे माध्यम से करवा रहा है|

मैं उसकी अभिव्यक्ति हूँ, मैं वही बोल रहा हूँ वह जो बुलवा रहा है| मैं वही कार्य कर रहा हूँ जो वह करवा रहा है| बस इतनी सी बात है, जिससे हम कर्म फल से बच  सकते हैं|

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