पढ़िए कर्त्तव्य  की महत्ता क्या होती है?

प्रभु द्वारा alloted duty को, कर्त्तव्य को,   पूरी ईमानदारी के साथ निभाना ही प्रत्येक की  पूजा है| वह यही देखता है कि मेरे द्वारा दी गई भूमिका को हर व्यक्ति बखूबी निभा रहा है या नहीं| यदि कोई माँ पूजा-पाठ-जप वगैरह को importance देते हुए उसमे लग जाए और छोटा सा बच्चा जो उस पर पूरी तरह से आश्रित हो,भूखा हो,उसपर ध्यान न दे,तो क्या कोई भगवान् उसपर खुश होगा?कदापि नहीं|

इसी लिए पहले अपनी duty,अपना कर्त्तव्य ईमानदारी से निभाओ,उसे तो काम करते हुए भी याद किया जा सकता है| इसी से वे प्रसन्न होते हैं|

इसी बात पर एक दृष्टांत याद आ रहा है —-

मोहन और सोहन  दो भाई थे| सोहन  पढ़े लिखे विद्वान् और पंडिताई करते थे| मोहन  का मन पढाई में न था,अत: बहुत कम पढ़ा था| सोचा गया कि शादी कर दें तो जिम्मेदार व्यक्ति बन जायेगा तो शादी कर दी गई| फिर भी काम धंधे में मन न लगा| मोहन के एक बालक भी हो गया| माता पिता का स्वर्गवास हो गया property का एक हिस्सा इसके हिस्से भी आ गया| इसका निठल्लापन भाई भाभी बिलकुल पसंद न करते| पत्नी ने भी कई बार सलाह दी कि  तुम कुछ काम कर लो,  कुछ कमा लो, परन्तु उसकी एक न सुनी|

कुछ समय बाद पत्नी अपने चार साल के बेटे को छोड़कर स्वर्ग सिधार गई| पत्नी का वियोग वह सह न सका| संसार से उसका मन हट गया और वैराग्य लेना चाहा|

उसने अपनी पत्नी के जेवर वस्त्र सब अपनी भाभी को दे दिए और कहा—भाभी  इस बेटे को भी अपना बेटा समझकर पालिए|

स्वयं उत्तराखंड का रास्ता पकड़ हिमालय की ओर  चल पड़ा, अच्छे- अच्छे महात्माओं का साथ किया| अंत में स्वामी देवानंद के शिष्य बन गए| खूब जप-ताप साधनाएं कीं| गुरु ने  उन्हें ऋषिकेश जाकर रहने की आज्ञां दी| वहां रहते हुए उन्हें इतना नाम मिला कि  लोग उन्हें उच्च कोटि के  महात्मा समझने लगे| उनके लिए जो भी भेंट की वस्तुएं आतीं वे उन्हें बँटवा देते| इतना सब कुछ होने के बावजूद भी मोहन  को शांति न मिल रही थी| ऐसा प्रतीत होता था जैसे अंत:करण  को घुन लग गया हो|

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हर समय दुखी और अशांत| इसका कारण जानने के लिए वे अपने गुरु के पास पहुंचे|

गुरु ने अंतर्दृष्टि से पता लगाया कि मोहन  का  एक इकलौता पुत्र है जो उसकी बड़ी माँ द्वारा दिए जा रहे दुर्व्यवहार से  अत्यन्त परेशान है|

गुरु बोले मोहन  तुम घर जाओ, तुम्हारा बच्चा पीड़ित हो रहा है, जिसके भरोसे तुम उसे छोड़  आये हो वही उसे सता रहा है|

जब तक उसकी आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी तब तक तुम कितना ही परिश्रम कर लो, कितना ही भजन पूजन कर लो भगवान तुमसे प्रसन्न नहीं हो सकते, न ही तुम्हें सफलता ही मिल सकती है|

जिनकी सेवा तुम्हारे सुपुर्द की गई है,उससे जी चुराना एकांतवास करना ,प्रभु की आज्ञा का उलंघन करना कायरता है|

जिस भी कार्य पर उसने हमें तैनात किया है उसे उसकी आज्ञा समझकर करते जाना ही हमारा कर्त्तव्य है और पूजा  (परमार्थ) भी | 

कर्त्तव्य पालन ही महत्वपूर्ण है| कर्तव्य करें और प्रसन्न रहें |

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