कर्तव्य पालन का फल

हमारे यहाँ प्रत्येक व्यक्ति के लिए कई महत्वपूर्ण कर्त्तव्य बताये गए हैं| इन कर्त्तव्यों का पालन करना ही चाहिए| इनमे से एक मुख्य और महान कर्त्तव्य है –अतिथि सत्कार| चाहे कोई धनी हो या निर्धन, किसी भी वर्ण, जाति का ही क्यों न हो| प्रत्येक गृहस्थ का यह एक मुख्य धर्म व कर्त्तव्य है कि वह अपने अतिथि की सेवा सुश्रुषा करे, यह एक महान यज्ञों में से एक है| जिस गृहस्थ के घर से कोई अतिथि बिना भोजन किये लौट जाता तो ऐसा मन जाता है कि हमारे सारे शुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं | इसी बात पर एक महात्मा, ऋषि की कहानी याद आ रही है|
मुदगल ऋषि कभी किसी की निंदा नहीं करते थे, नम्र सात्विकी स्वभाव के, एवं सत्यवादी भी थे| साथ ही अतिथि सेवा का व्रत भी धारण कर रखा था| वे तीन प्राणी थे, जो कि हर पन्द्रहवें दिन अर्थात् सिर्फ अमावस्या और पूर्णिमा को यज्ञ करते, द्वार पर आये हुए भूखों को भोजन कराते जो कुछ बच जाता, तीनों प्राणी बांटकर खा लेते| कर्त्तव्य मानकर, शुभ इच्छा से दिया हुआ दान बरक्कत,वृद्धि करता है,ऐसा दान जो मान,बड़ाई के लिए किया जाता है वह निष्फल जाता है| प्रत्येक कर्म में ऋषि की भावना निष्काम रहती थी| यही कारण था कि उनके यहाँ धान्य कभी घटा ही न था| बीसियों ब्राह्मण भूखे आके जमा हो जाते, मुदगल उसी में से सबको संतुष्ट कर देते और स्वयं और घरवालों को भी पूरा पड जाता था| यही उनका नियम था| ऐसों की परीक्षा भी होती है, और महर्षि दुर्वासा को परीक्षा लेने के लिए भेजा गया| बड़ी ही विचित्र हालत में वे पहुंचे, मूडमुडाये, नंग धडंग,पागलों के से गालियाँ बकते हुए| बोले—मैं बहुत भूखा हूँ मुझे भोजन दे| घर में जितना भी खाना था सारा चटकर गए और जो जूठन बची वह भी शरीर में पोत गए| इस कारण घर वालों को फिर पंद्रह दिनों तक भूखे रहना पडा|
इन पंद्रह दिनों में करीब पंद्रह किलो धान्य इकठ्ठा कर लिया था| ऋषि, पत्नी बच्चे ने मिलकर भोजन सामग्री तैयार की| यज्ञ हुआ फिर भोजन के लिए बड़ा ही गंदा सा रूप लेकर पहुँच गए दूर्वासा महर्षि और बोले मैं भूखा हूँ भोजन दो, कहा और तुरंत बैठकर सारी सामग्री चाट गए, और निकल गए| इस प्रकार हर पन्द्रहवें दिन आ जाते| इस प्रकार तीन महीने निकल गए|
परन्तु लगातार इतना कष्ट होने पर भी, स्वयं को पत्नी बच्चे, अन्न न मिलने पर भी, इन तीनों के हृदय में कोई विकार न दिखा महर्षि दुर्वासा को| वही श्रद्धा, वही सत्कार, वही प्रसन्नता, वही शांति इन तीनों में दिखी|
वे प्रसन्न हो गए| बोले—मुदगल! तुम धन्य हो| भोजन के अभाव में मनुष्य कौन सा पाप कर्म नहीं करता है? शास्त्रों ने इसे सबसे बड़ा तप माना है| दान देना अच्छा है, पर दान की भी कोई मर्यादा होती है| इस अवस्था में भी तुमने व्रत नहीं छोडा| मैंने तुम्हें बहुत कष्ट दिया, मैं क्षमा चाहता हूँ| तुम्हारे दान की चर्चा सब तरफ बहुत फैल रही थी, इसी लिए मुझे तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए भेजा गया|
तुम उत्तीर्ण हुए| तुम्हारा तप पूर्ण हुआ, आगे तुम्हारा कल्याण होगा, यह निश्चय जानो|
प्रियवर! दान से बढ़कर कोई तप संसार में है ही नहीं| तुम्हारी परीक्षा लेने आये हुए, दुर्वासा मुनि को दान देकर तुमने अपना कर्त्तव्य भली भाँति निभाया, इसके फलस्वरूप आपलोगों को लेने के लिए सुन्दर विमान आया है जिसमे बैठकर आप स्वर्ग जायेंगे| जहाँ सुख ही सुख हैं| ऐसा देवदूतों ने कहा|
मुदगल बोले—मैं वहां न जा सकूंगा| मैं यहीं रहकर अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहता हूँ|

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Comments 0

  1. Madan MohanGupta says:

    मैंने आपके अनेक लेख पड़े तथा पढ़ रहा हूँ । बहुत ही सुनदर हैं ।

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