जब कभी भी कोई व्यक्ति हमें कोई दूर की चीज दिखाना चाहता है तो अक्सर हम उसे छोड़ इर्द गिर्द की चीजों को ही देख लेते हैं| जब निशाना लगाने की परीक्षा गुरु द्रोणाचार्य जी द्वारा ली गई थी तब अर्जुन को छोड़ बाकी सब को लक्ष्य को छोड़ आस–पास की सारी चीज़ें दिखाई दे रहीं थीं|
एक बार एक संत ने अपने शिष्य से जो उम्र में उन से बहुत ही छोटा था, साथ में सिनेमा देखने चलने को कहा| चूँकि गुरु आज्ञा थी वह साथ हो लिया| तरह-तरह के दृश्य सामने आते—कभी-कभी अश्लील दृश्य भी आ जाते बेचारा शिष्य शर्म से गड जाता, तो कभी सुख-दुःख, हंसी-मज़ाक, मार-पीट, प्यार-मोहब्बत के दृश्य| ये तो पिता से भी बड़े थे उम्र में| शिष्य को कुछ समझ में नहीं आया कि ये गुरूजी सिनेमा दिखाने क्यों साथ ले आये|
सिनेमा समाप्त हुआ, वे पूछने लगे कि तुमने क्या देखा? शर्माते हुए कुछ दृश्यों का वर्णन किया| फिर गुरु ने पूछा क्या — तुमने कहानी के अलावा और कुछ देखा? शिष्य ने सर हिलाकर नहीं में उत्तर दिया|
अब गुरूजी ने कहा- तुमने तो मुड़कर कुछ देखा ही नहीं, सामने पर्दे पर ही देखने में व्यस्त थे
तुम्हारे ऊपर से एक छिद्र से होकर एक प्रकाश पुंज आ रहा था,जो परदे पर फैल रहा था और इसी प्रकाश के कारण उन तस्वीरों मे चेतानता आ गई जो जड़ थीं और वो चलने फिरने लगीं| इसी प्रकार यह संसार भी एक रंगमंच है| जिसपर उस सर्वशक्तिमान के प्रकाश द्वारा यह खेल (ड्रामा) चल रहा है|
विभिन्न दृश्यों को देख हम कभी हँसे कभी रोये, जैसे किसी ने किसी को मार डाला, जिससे हमें दुःख हुआ| ड्रामे के अंत में अभिनेता अभिनेत्री का मिलन हुआ सब खुश हो गए| यहाँ कोई वास्तविकता तो थी ही नहीं सिर्फ एक खेल चल रहा था| ऐसी ही स्थिति अर्जुन की थी, जब वे रण भूमि पर पहुंचे तो भगवान् कृष्ण ने पहले ही बता दिया था कि ये सब पहले ही मर चुके हैं, तब अर्जुन के समझ में बात आई|
गुरु शिष्य से बोले तुमने देखा नहीं, पीछे एक छिद्र से जो प्रकाश आ रहा था, वहां एक व्यक्ति बैठा रहता है जो सारे खेल को अपने नियंत्रण में लिए रहता है, जिसे हम ऑपरेटर कहते हैं| यह व्यक्ति सिर्फ यह देखता है कि ड्रामा ठीक से चल रहा है या नहीं| न उसपर कहानी का कोई असर पड़ता है न ही उसमे आये सुख-दुःख का असर| वह तो इन सब से परे है| फ़िल्म चलते वक़्त कभी रील ज्यादा तेज चल जाये या कभी धीमी चल जाये, कभी टूट जाये तो जोड़ देगा,
इन सब बातों पर पब्लिक उसे गाली दे या आशीर्वाद उसे उससे कोई मतलब नहीं|
यदि हम इस जानकारी को हासिल करना चाहें तो हमें ऑपरेटर से पहिचान करनी होगी, जिससे सारा रहस्य सामने आ जायेगा,ऐसी स्थिति में न हम पर हर्ष व्यापे न शोक| परन्तु यह पहचान करना कठिन काम है, क्योंकि उसके कमरे में जाना सख्त मन होता है|
एक व्यक्ति और होता है जो हर्ष शोक से परे होता है वह है गेट कीपर, जिसकी पहुँच बाहर भी है और भीतर भी है| इससे जानपहिचान कर लेने पर उसके मौज़ आने पर, वह ऑपरेटर से जान पहिचान करा सकता है, जो अपने साथ ले जाकर उसके सामने खडा कर देगा|
इस बात से शिष्य की आँखों पर से पर्दा दूर हुआ और उसने उनके चरण पकड़ लिए,कहा अब संभव हुआ देखना जो आप दिखा रहे थे|

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