किसी महापुरुष के अनुसार किसी भी व्यक्ति की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है,

परन्तु किसी लालची व्यक्ति के लालच को पूरा करना असंभव है| यह एक ऐसी इच्छा है जिसे

पूरा करने के बाद भी इंसान कभी तृप्त नहीं होता| अपनी इच्छा पूर्ति ने लिए न जाने कैसे कैसे

पाप करता जाता है कि जिसका कोई हिसाब ही नहीं| किसी व्यक्ति के पास कोई वस्तु देखता है

तो लालच में आ जाता है कि वह वस्तु हर हाल में मुझे चाहिए ही| विवेक शून्य हो जाता है,

अपने रिश्तों की भी परवाह नहीं करता, अर्थात् सभी अनर्थों का मूल हैयह लालच| लोभी व्यक्ति

की स्थिति उस गधे के सामान है जो अपने पीठ पर धन को लादकर तो चलता है परन्तु, उसका

उपभोग नहीं कर सकता न दूसरे ही कर सकते हैं| यह लालच किसी भी चीज़ की हो सकती है|

किसी को किसी का लालच तो किसी को और किसी का जैसे धन संपत्ति ,सोना-चाँदी,तो किसी

को मान बड़ाई|परन्तु जिस व्यक्ति का विवेक जाग्रत हो तो वह कभी इनके पीछे न भागे|

इसी बात पर मुझे एक छोटी सी कहानी याद आ रही है| इस घटना से तो ये भी समझ

में आ रहा है कि कभी कभी तो बड़े बड़े योगी में इसके चक्कर में पड जाते हैं| एक महान योगी

हुए, जिन्होंने शांति की खातिर सारा राज्य ही छोड़ दिया और शांति की तलाश में निकल पड़े|

रात्रि का वक़्त था एक गाँव के पास से गुज़र रहे थे,चाँदनी रात थी एक वृक्ष की छाँव में एक

बहुत ही लाल रंग का कोई रत्न सा दिखाई दिया, वे आगे बढ़ने लगे, मन ने सोचा कोई अनमोल

रत्ना होगा परन्तु, अन्दर से आवाज़ आई कि हमें क्या करना? परन्तु मन ने फिर आग्रह किया

कि किसी और को दे देंगे| बस मन की बात मान ली और उठाया तो हाथ सन गया, देखा तो वह

किसी की पान की पीक थी, बड़ा ही पश्चाताप और दुःख हुआ|

ऐसी ही एक और घटना याद आ रही है| एक बार एक व्यक्ति को राज दरबार में पुरस्कार

के लिए बुलाया जाता है| द्वारपाल कहता है मैं तुम्हें एक ही शर्त पर जाने दूंगा ,वह क्या? तो

बोला तुम्हें जितना भी मिले उसका ५ गुना तुम्हें, मुझे देना होगा, उसकी बात पर गुस्सा होकर

उस व्यक्ति ने कहा अरे मैं तो तुम्हे १०० गुना दूंगा| अन्दर जाकर उसने राजा को प्रणाम किया|

इसपर राजा ने पूछा क्या तुम वही बहादुर व्यक्ति हो जिसने शेर से एक व्यक्ति की जान बचाई?

उसने कहा जी महाराज| महाराज ने पूछा ,कि तुम्हें पुरस्कार के रूप में क्या चाहिए? इसपर

उसने कहा कि महाराज मुझे तो सिर्फ एक कोड़ा चाहिए| राजा ने कहा कि अरे मैंने तो तुम्हें

ईनाम देने के लिए बुलाया, और तुम ये क्या मांग रहे हो| मैं वैसे तो कुछ और ही माँगता परन्तु

आपके समक्ष आने के पूर्व एक लोभी द्वारपाल ने मुझ से मिलनेवाले ईनाम का ५ गुना माँगा|

मैंने उसे १०० गुना देने का वचन दिया| इसी बात पर राजा को युवक की बहादुरी के अलावा

उसकी समझदारी पर प्रसन्नता हुई और उसे ईनाम में १०० अशर्फियाँ देकर लोभी द्वारपाल को

१०० कोड़े का दण्ड दिया|

प्रत्येक व्यक्ति हर क्षण, हर पल इसी लालसा की अग्नि में दहकता रहता है| संसार में इससे तुच्छ

असार और विनाशकारी कुछ भी नहीं है| जो व्यक्ति एक बार इसके चक्रव्यूह में फँस जाता है वह

लाख कोशिशों के बाद भी बाहर नहीं निकल पाता| इसीलिए जो विवेकशील होते हैं इससे

बचकर रहते हैं| एक संत महात्मा कहते हैं कि संसार को भोगने से पूर्व, उसके योग्य तो बनो

अन्यथा संसार ही तुम्हें भोग डालेगी| जैसे मिट्टी के घड़े को पहले घनी आग में रखा जाता है तब

वह अपने में जल रोक पाता है, अन्यथा वह जल ही उसे गला देगा |मन माया है,उसकी जो

माने, झूठ ही मनवाएगा| मनुष्य की स्थिति के बारे में कहा है कि १.खुद कमाओ खुद खाओ –यह

प्रकृति है | २.कमाओ ही नहीं छीनकर खाओ यह विकृति है| ३.खुद कमाओ और दूसरों को

खिलाओ यह संस्कृति है|

परमात्मा के प्रति प्रेम और सांसारिक लोभ एक दूसरे के विपरीत हैं इसलिए, हमें यह प्रयास

करना है कि, हम इस लोभ की दिशा डायरेक्शन को बदल दें और इस लोभ लालच को

सांसारिक चीज़ों से हटाकर, परमार्थ की ओर लगायें| स्वयं को मुसीबतों से बचाएं|

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