मैं अपने घर के आँगन में बैठी हुई थी| मेरे पास कुछ बच्चे बैठे हुए थे| उनकी दृष्टि वहीं कुछ दूरी पर बैठे हुए पक्षियों पर पड़ी| कहने लगे (madam) मैडम देखिये न ये काले-काले पक्षी कौवे हैं न |मैंने कहा कि कला है तो कौवा ही हो ऐसा जरूरी नहीं| बच्चे पूछने लगे तो फिर ये क्या हो सकते हैं? मैंने कहा ये कोयल भी हो सकते हैं| दोनों देखने में तो एक जैसे ही दीखते हैं परन्तु इनको देखकर बताया नहीं जा सकता की कौन कौवा है और कौन कोयल है|फिर हम पहिचानेंगे कैसे ? तब मैंने उन्हें समझाया की जब वसंत ऋतु आती है तब कोयल अपनी मीठी आवाज़ से पहचानी जाती है और कौवा अपनी कर्कश आवाज़ से|

कर्कश वाणी किसी को भी अच्छी नहीं लगती| सभी को ऐसी मीठी वाणी ही पसंद आती है जो जिसे सुनकर ऐसा लगे कि उसमे मिश्री ही घुली हो|तुम सबने चेते बच्चों की बातें तो सुनी ही होंगी! कि वे कितना मीठा बोलते हैं! और हम सबयह चाहते हैं कि वे बार –बार बोलें|

ऐसे ही आपने गाना भी सुना होगा |अगर कोई ऐसी कर्कश आवाज़ में गाये या बेसुरा गाये तो हम तुरंत बोलते हैं भई ! बंद करो ,अब सुना नहीं जाता |तुम्हारी आवाज़ में तो मिठास ही नहीं है |पर वही अगर दूसरे ने मीठी सुरीली आवाज़ में गए तो हम सब कहते हैं (please once more)कृपया एक बार और|

इसीलिए महात्मा तुलसी दासजी ने कहा है –

तुलसी मीठे वचन ते सुख उपजत चहुँ ओर |

वशीकरण यह मंत्र है परिहरु वचन कठोर ||

अगर हम मीठा बोलते हैं तो सबको सुख मिलता है ,सबको अच्छा लगता है |वही हम कड़वा बोलते हैं अर्थात् डाँटते हैं चिल्लाकर बोलते हैं तो किसीको भी अच्छा नहीं लगता |इसलिए मीठा ही बोलना है

इसी प्रकार कबीरदासजी ने भी कहा है

ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय | औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होय ||

अर्थात वाणी इतनी मधुर हो की अगला व्यक्ति उसके आवाज़ की मिठास में खो जाये |दूसरों को शीतलता पहुंचाए और खुद भी शीतल हो |

इसी प्रकार रहीमजी ने भी मधुर वाणी को बहुत महत्व दिया |

वे कहते हैं कि जब तक कोयल और कौआ चुप हैं तो उनमे भेद करना बड़ा ही कठिन है |इस बात से मुझे एक और बात समझ में आई –किसी भी विषय बार बोलना हो तो जो उस विषय का जानकार होगा वह मुंह खोले तो सारा hall तालियों की गडगडाहट से गूँज उठता है ,तो दूसरी तरफ जिसे अपने विषय की जानकारी ही न हो ,जब वह मुँह खोले तो ,राज की बात पता चल जाती है कि उसे कुछ आता ही नहीं ,वह दो शब्द कहकर सर झुकाकर खड़ा रह जाता है |

वाणी का प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क यहाँ तक कि हृदय तक पहुँचता है |इसलिए जरूरी है कि हम बोलते समय मधुर ,कर्णप्रिय,सकारात्मक,नपे-तुले शब्दों का प्रयोग करें ,जिससे सुनने वाले को सदा ही लाभ हो |

यह अत्यावश्यक है कि —जो बात मन में हो वाही होंठों पर आये ,बनावटीपन आते ही बोली जानेवाली वाणी, मधुर-वाणी होते हुए भी,उसमें कृत्रिमता के कारण फीकापन आ जाता है |इसलिए आवश्यक है कि हम अपने में डबल करैक्टर(double character )न आने दें अपना व्यवहार भी मधुर बनाएं |अतिथि के आने पर चेहरे पर ख़ुशी और आँखों में स्नेह के साथ उनका आवभगत करें|

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