मानवता

आज मैं अपने ही बच्चों के साथ बैठी हुई थी | बातों बातों में एक ने कहा अरे! सुनो न माँ ! मुझे तो लगता है इस धरती पर मानवता तो है ही नहीं | मैंने पूछा,कि तुम्हें ऐसा क्यों लगा? तो श्याम ने कहा – आज ही मैंने देखा कि किसी ने बरैय्यों के छत्ते को हिला दिया तो कुछ बरैय्ये जाकर एक बच्चे से चिपक गए, जो वहीं से गुजर रहा था| बुरी तरह रो रहा था बेचारा | पर कोई आया ही नहीं मदद के लिए| मुझे तो ऐसा लगा जैसे मनुष्य में मनुष्यता ही नहीं रही | मैंने कहा –नहीं भई! ऐसी भी कोई बात नहीं है | हमारे ही देश में ही कई परोप कारी,शरणार्थी को शरण देने वाले , बड़े बड़े दानी भी हुए | कितना विशाल हृदय होता है इनका ! कुछ भी मांग लो इनकार ही नहीं करते ! मैंने कहा कि ऐसे लोग केवल कहने मात्रके लिए मानव या मनुष्य नहीं होते, इनमे मानवता ,मनुष्यता कूट –कूटकर भरी होती है| जैसे-दानवीर कर्ण , दधीचि ,शिबि|
इन दानवीरों के नाम सुनने की देर थी कि सब पीछे पड गए –please सुनाइए न इनके चरित्र | फिर मैंने महाराजा शिबि के बारे में बताया — इंद्र को भय हो गया था कि महाराजा शिबि के कारण उनका सिंहासन न छिन जाए| इन्द्र ने, राजा का दान व्रत भंग करने के लिए कठिन परीक्षा ली और राजा उस परीक्षा में पास हो गए| पता है एक पक्षी राजा की शरण में आ गया और शिकारी आकर कहने लगा कि वह पक्षी मुझे देदो| शरणागत पक्षी की जान बचाना राजा का फ़र्ज़ था इसलिए शिबि ने देने से इनकार कर दिया |इसपर शिकारी बोला की पक्षी के वज़न के बराबर अपना मांस काटकर दे दो|इसपर रजा ने अपना मांस काटकर दे दिया ,परन्तु पक्षी को वापस नहीं दिया |इसपर इंद्र बहुत शर्मिंदा हुए |और बता दिया कि हम तो तुम्हारी परीक्षा लेने आये थे |
एकबार देवताओं और असुरों में युद्ध हुआ देवता हार गए | उन्हें किसी ने सलाह दी थी कि अगर महात्मा दधीचि के हड्डियों से अस्त्र बने तो ही असुरों का विनाश संभव है| देव, महर्षि दधीचि के पास पहुंचकर ऐसा ही बोले, कि आप कृपा करके अपनी हड्डियाँ हमें देदें तो हम असुरों का विनाश कर सकेंगे | और उस दानवीर महा मानव ने सहर्ष अपनी हड्डियां तक दान में दे दीं |
इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति शरणागत को देखकर ही डर जाए कि ये कुछ मांगने तो नहीं आ गया, इससे कहीं मेरा अहित तो नहीं हो जायेगा? इस तरह की सोच रखने वाले निकृष्ट व्यक्ति को देख भी लो तो हमें पाप लगेगा|
सच्चे मनुष्य वे हैं जो दोहरा चरित्र नहीं रखते ,जो सबको खुशियाँ और मुहब्बत बांटते हैं, जो उच्च पद निम्न पद, जाति भेद ,धर्म भेद न करे सबसे समता का व्यवहार करे |परन्तु हमें आज भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है | हमारे देश में कई परोपकारी, दानवीर, अपने वचन पर कायम रहनेवाले अब भी हैं|
इसलिए हमें वास्तव में मनुष्य बनना है अपना और समाज का भला करना है यही सच्ची मानवता है | यही सच्ची मनुष्यता है|

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