मित्र ऐसा चाहिए जैसे कृष्ण और सुदामा| मित्र कभी भी अपने मित्र के अवगुणों को छिपाने वाला, उसके गुणों का बखान करनेवाला, तथा कमियों को बड़े ही स्नेह से दूर करने वाला, अच्छा मार्गदर्शक, भरोसेलायक, अच्छा सलाहकार हो, तो ही मित्रता सार्थक है| विपत्ति के समय ही सच्चे मित्र की पहिचान होती है| एक सच्चा मित्र, अपने मित्र की हर परिस्थिति में मदद करता है क्योंकि, सच्चा मित्र, जो गुणों का पुंज हो, उसका साथ कभी भी छूटना नहीं चाहिए| इस मित्रता को अखंड रखने के लिए हमें सम्पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए|                                                मेरे जीवन में भी ईश्वर की कृपा से, मुझे ऐसी मित्रता निभाने वाली सहेली का साथ मिला| जो मेरा बडा   ही ख्याल रखती थी, आज भी याद करो तो आश्चर्य होता है  कि  क्या ऐसा भी हो सकता है? उन दिनों मैं अत्यधिक अस्वस्थ रहती थी| उनके कॉलेज में हर सब्जेक्ट के नोट्स मिलते थे और मेरे college में नहीं| मेरी सहेली मेरे घर आकर प्रश्नो के उत्तर पढ़कर सुनाती उनको समझाती थी और मैं सिर्फ सुनकर exams देकर आती थी| वास्तव में ऐसा मित्र तो वरदान ही है| भला!  ऐसी मित्रता  और मित्र को कौन छोड़ना  चाहेगा| कैसा निस्स्वार्थ प्रेम! याद करो तो आँखें नम हो जाती हैं |  यह इसे सिद्ध करता है कि ऐसे मित्र इस युग में भी मौजूद हैं,  ऐसा नहीं कि  सिर्फ त्रेता युग, द्वापर युग में ही ऐसे मित्र हुआ करते थे|

हमने सच्चे मित्रों के कई उदाहरण सुने  हैं|  जैसे सुदामा और कृष्ण| कहाँ इतने बड़े राजा श्रीकृष्ण और कहाँ गरीब ब्राह्मण सुदामा!  पत्नी के request करने पर बड़े मुश्किल से सुदामा, श्रीकृष्ण के पास पहुंचते हैं| उनकी दयनीय दशा देखकर द्वारपाल पूछता है कि किनसे मिलना चाहते हैं ?  जवाब दिया मेरे बचपन के मित्र श्रीकृष्ण से मिलने आया हूँ|

द्वारपाल के द्वारा किए गए सुदामा के वर्णन को नरोत्तम दास जी ने बड़े ही मार्मिक रूप से वर्णित किया है| न सिर पर पगड़ी, न पैरों में चप्पल इत्यादि| वर्णन सुनते ही श्रीकृष्ण ऐसे भागे, अपने मित्र के स्वागत में, कि वे नंगे पैर ही दौड़ गए, और मित्र की दयनीय स्थिति देखकर इतना अधिक दुखी हुए कि, अवर्णनीय है| शब्द कम पड जाते हैं| श्रीकृष्ण पूछते हैं, हे मित्र!  इतने दिन तुम कहाँ रहे?  उन्हें अपने आसन पर बिठाकर, जब पैरों की दशा देखी तो करुणासागर रो पड़े| उनकी आँखों से निकले हुए आंसुओं से ही सुदामा के चरण पखार दिए, जो जल लाकर रखा हुआ था उसे उन्होंने हाथ भी नहीं लगाया|

उन्हें अच्छा  भोजन कराया और बिदा किया| जब वे लौटकर अपने गाँव पहुंचे तो उन्होंने देखा कि मित्र ने तो उन्हें बिलकुल कृष्ण ही बना दिया| वैसा ही महल वैसा ही शान औ शौकत| वे भ्रमित हो गए कि  मैं कहीं वापस वहीं  तो नहीं लौट आया?   और  पूछने लगे कि  यह कौनसी जगह है? कौन सा शहर है?

मित्रता हो तो ऐसी हो जहाँ अमीरी गरीबी का भेद भाव न हो |

मित्र की स्थिति सुधार कर अपने मित्र को अपने जैसा ही बना दे |                                  

मित्र की परीक्षा मुसीबत के वक़्त ही होती है |

 

आपको यहाँ लेख कैसा लगा? हमे अपने विचार नीचे comment box के माधयम से बताएँ।  

Comments to: मित्रता

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Attach images - Only PNG, JPG, JPEG and GIF are supported.