श्रद्धा और विश्वास

कुछ शब्द सुनने मे बड़े भारी से लगते हैं,परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं होता, जैसे श्रद्धा और विश्वास| अगर हम बचपन से ही देखें तो, हमें अपने parents पर कितना विश्वास होता है| छोटे से बच्चे को भी वे कहें कि कूद जा तो वह पूरे विश्वास के साथ कितनी ही ऊँचाई से कूद जायेगा क्योंकि वह यह जानता है कि वे हमें पकड़ लेंगे गिरने न देंगे| इसी प्रकार हमें अपने parents के लिए श्रद्धा का भाव रहता है, जिसे हम उनके प्रति रखते हैं, हम चाहते हैं कि सभी लोग हमारे माता-पिता को उतनी ही श्रद्धा भरी निगाहों से देखें जितनी हम|

आगे चलकर अपने जीवन में हम फिर उस सर्वशक्तिमान के प्रति भी तो, चाहे हम उसे किसी भी नाम से संबोधित करें, श्रद्धा भक्ति विश्वास आदि भाव रखते हैं| इसी बात पर मुझे एक दृष्टांत याद आ रहा है|

परिक्रमा करते रहने वाले दो महात्मा थे, जो उस सर्वशक्तिमान के प्रति पूरी तरह श्रद्धा-विश्वास रखते थे| वे दोनों घूमते-घूमते बरसाना में राधा जी के मंदिर पहुंचे, अँधेरा हो चुका था तो दोनों ने वहीं बाहर आँगन में रात सोने का सोचा और मन ही मन ये भी सोचा कि आज राधाजी का आतिथ्य मिलेगा अर्थात् हम राधाजी के अतिथि हैं वे हमारे खाने की भी व्यवस्था करेंगी| परन्तु यह बात तो उन्होंने भले ही मजाक में ही सोचा हो| परन्तु मन में यह विश्वास भी था कि यदि राधा जी चाहेंगी तो अन्य अतिथियों की तरह हमारी भी सेवा हो जाएगी और भूख मिटाने का साधन बन जाएगा| अपना बिस्तर लगाकर ये दोनों ही सो गए|

रात को वहां के पुजारी को स्वप्न आया जिसमे राधा जी कह रही हैं कि, मंदिर में हमारे दो मेहमान आये हैं, उनके लिए भोजन की व्यवस्था करो| पुजारी ने आकर जोर-जोर से आवाज़ लगाई कि यहाँ राधाजी के दो मेहमान कौन हैं ? इनलोगों ने सोचा कि और कोई होंगे, जिनके लिए ये पूछ रहे हैं, इसलिए उनने कोई जवाब नहीं दिया| जब पुजारी ने सब तरफ ढूँढा तो पता चला कि ये वही दोनों मेहमान हैं| पुजारी ने अच्छे से उन्हें भोजन कराया| थोड़ी देर बाद वे तृप्त होकर सो गए|

थोड़ी देर बाद दोनों को एक ही समय में सपना आया जिसमे एक बारह –तेरह साल की कन्या आयी और पूछी –आप लोगों ने भरपेट भोजन तो किया न! और बोली कि आज भोग में तो बढ़िया पान भी रखा था, परन्तु वह देना भूल गया ये ले लो बोलकर सिरहाने पान का बीड़ा रखकर वह गायब हो गई| इस स्वप्न के कारण दोनों की नींद खुल गई दोनों ने अपना सपना एक दूसरे को सुनाया, जब उनने उठकर देखा तो वास्तव में वहां पान थे| दोनों राधा जी का प्रसाद पाकर धन्य हो गए

यह था राधाजी में उनकी श्रद्धा और विश्वास का प्रमाण|

यह तो होना ही था क्योंकि दोनों को ही राधा जी पर सौ प्रतिशत का भरोसा था| ऐसी परिस्थिति में वह सर्वशक्तिमान उनके श्रद्धा विश्वास को कैसे तोड़ता?

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जिस प्रकार हमारे माता –पिता हमारे विश्वास को नहीं तोड़ते वैसे ही, यहाँ भी है क्योंकि वह तो हम सबका माता-पिता है| हमें भी इस बात का ध्यान रखना है कि हमें हमेशा किसी भी व्यक्ति के विश्वास को कायम रखना है और उन्नत्ति के पथ पर अग्रसर होना है|

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