सच्ची उन्नति

विचारों की उन्नति ही सच्ची उन्नति है| मानसिक विकृति का मुख्य कारण वातावरण में अच्छे विचारों की कमी ही है| यदि सद्विचार अधिक मात्रा में उपजाए जाएँ तो, इस मानसिक विकृतिरूपी, प्रदूषण को दूर किया जा सकेगा| जिस प्रकार धूप सूर्य से, पानी समुद्र से, अन्न धरती से मिलता है, उसी प्रकार सद्विचार सत्पुरुषों से ही मिलते हैं | उन्हीं को हम विवेक कहते हैं| विवेक उसी प्रकार से आवश्यक है जिस प्रकार मनुष्य के लिए नेत्र, जिसके द्वारा हम यह तय कर सकेंगे कि मुझे क्या करना चाहिए, क्या नहीं| अशुभ विचार घटने लगें, शुभ विचारों का उदय हो| मनुष्य की उन्नति इसी से होगी| परन्तु यह कार्य इतना आसान भी नहीं है, इसके लिए विचारों को सबल बनाना होगा, सही-गलत विचारों की परख का होना अति आवश्यक है, जो सूक्ष्म दृष्टि से ही संभव है, जो सच्चे संत के पास होती है|
इसी बात पर मुझे एक दृष्टांत याद आ रहा है— एक राजा थे, वे किसी संत के दरबार में जाने लगे| उनके सुन्दर विचारों से राजा, संत की ओर आकर्षित हो गए| उन्हें उनकी संगति से आनंद की अनुभूति होने लगी, जिससे उन्हें यह विश्वास हो गया कि इनकी कृपा से मेरा वह कार्य भी पूर्ण हो सकेगा| हाय एक संतान! यही वासना उन्हें सताया करती थी, सोचा किसी तरह महात्माजी राजी हो जाएँ तो उन्हें महल में ले चलूँ,रानी को आशीर्वाद प्राप्त हो जायेगा, तो संभव है कि पुत्र का मुंह देख सकूं|
बस एक दिन प्रार्थना की कि प्रभो! एक दिन मेरे घर को पवित्र कीजिये, और वे राजी हो गए| राजा ने महल का कोना-कोना साफ करवाया, सुगन्धित वस्तुएं रखी गयीं| धूप-दीप से आरती की गई| रानी ने चरण पखारे| महात्माजी कुछ देर बैठकर बोलने लगे राजा! जल्दी चलो यहाँ बड़ी दुर्गन्ध आ रही है| राजा ने चारों ओर दृष्टि दौडाई,पर कहीं कोई दुर्गन्ध फैलाने वाली वस्तु या दुर्गन्ध नहीं थी| पर महात्माजी न माने बोले जल्दी चलो|
राजा उन्हें लेकर निकले परन्तु, उन्होंने तो दूसरा ही मार्ग पकड़ लिया, राजा ने मना किया कि यह रास्ता गन्दा है यहाँ से न चलें, परन्तु वे न माने| वहां मोचियों की दूकानें थीं, चमड़े की बड़ी दुर्गन्ध आ रही थी| राजा ने कहा –महाराज यहाँ तो चमड़े की बड़ी दुर्गन्ध आ रही है, महात्मा बोले- यहाँ तो कोई दुर्गन्ध नहीं आ रही है|
एक मोची को बुलाकर पूछा क्यों भाई! यहाँ कोई दुर्गन्ध आ रही है? वह बोला नहीं तो! हम तो यहाँ रोज काम करते हैं, दुर्गन्ध होती तो कैसे काम करते?
महात्माजी बोले —जैसे आपको महलों की दुर्गन्ध का पता नहीं चल रहा था, वैसे ही इन मोचियों को चमड़े की दुर्गन्ध नहीं पहिचान में आती है| आपके महलों में तो मोची के यहाँ से भी अधिक दुर्गन्ध है|
मनुष्यों के दु:खों की कराहें, धन की मादकता और तेरी कामनाओं के अम्बार बहुत दुर्गन्ध दे रहे थे| बस; जहां सुन्दर विचार हैं, वह स्थान स्वर्ग से भी ऊँचा है| विचारों में ही दुःख और सुख है| उत्तम विचार सत्कार्यों की ओर प्रेरित करते हैं|
वे बोले –एक दिन जब मैं ध्यान में बैठा था तो मुझे ऐसा आभास हुआ कि मेरे गुरु मुझसे कह रहे हैं — अरे! मैं तेरे पास इतने सद्विचार भेजता हूँ, परन्तु तू बेखबर सोता है और उन्हें सम्हालता ही नहीं!
सद्विचारों का संग्रह एक अद्भुत संपत्ति है| इससे वह तो सुखी रहते ही हैं, साथ ही उसके संपर्क में आने वाले लोग, और जो उन्हें नहीं जानते वे भी| आस-पास का वातावरण अच्छे विचारों से ओतप्रोत हो जाता है जिससे वातावरण शुद्ध हो जाता है लोगों में अच्छे विचार आ जाते हैं| दुर्विचारों का प्रदूषण भी दूर हो जाता है| इसी में सच्ची उन्नति है|

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