कभी-कभी हम अपने जीवन में देखते हैं कि किसी –किसी में कुछ ऐसी आभा, ऐसा व्यक्तित्व होता है कि हम उनकी तरफ़ अनायास ही खिंच जाते हैं| ऐसे लोगों के पास बैठकर हम अपने आप ही इतने शांत हो जाते हैं कि हमारा मन बिना किसी प्रयास के ही सोचना बंद कर देता है| ऐसी स्थिति में जिस आनंद की अनुभूति होती है वह शब्दों से परे है, और ऐसा लगता है कोई यह न कहे कि यहाँ से चले जाओ| वहाँ न कोई वक्ता होता है, न कोई श्रोता, परन्तु आनंद की (फैज़ )की बारिश होती है| हो सकता है कि आप लोगों मे से कइयों ने इसका अनुभव किया भी हो|
संगति के प्रभाव के बारे में हम सब जानते ही हैं| पारस पत्थर अपनी संगति में, संपर्क में आने पर सिर्फ लोहे को सोना बना सकता है किसी अन्य धातु को नहीं| इसी प्रकार जैसे कि ऊपर कुछ लोगों का वर्णन किया है ऐसों के पास भी खास किस्म का स्वभाव लेकर गए तो वह कभी भी खाली नहीं लौटेगा| पारस, लोहे को, कभी भी अपने जैसा नहीं बना सकता, हाँ कीमती धातु बना देता है, इसी प्रकार कुछ लोग साधारण अवस्था से कुछ ऊँचा उठा सकते हैं|
कुछ महान लोग मलयागिरि की तरह होते हैं, मलयागिरि चन्दन अपनी खुशबू अपने आस पास के सारे वृक्षों को दे देता है, इसी प्रकार उन महात्माओं के संपर्क में जो भी आते हैं उनके अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करते हैं, कुछ समय की संगति का ऐसा असर होता है कि वे इन जैसे ही श्रेष्ठ और उत्तम बन जाते हैं| परन्तु कुछ पेड़ जैसे चीड,बबूल शीशम इस खुशबू को ग्रहण नहीं कर पाते, ऐसे ही कुछ मनुष्यों पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता|
मनुष्य के ऊपर संगति और ख्याल का बड़ा ही प्रभाव पड़ता है, जिसका आप ज्यादा ख्याल करने लगेंगे आप वैसे ही बन जायेंगे| जैसे कि उडनेवाला कीड़ा होता है, अपने खाने के लिए दूसरे कीड़े को पकड़ लाता है और उसको मिट्टी के अन्दर कैद कर देता है, वह कीड़ा, भृंगी के डर से हर समय उसके ख्याल में ही रहता है, जिसका नतीज़ा यह होता है कि उसके भी पंख निकल आते हैं, उसके और भृंगी के रूप में कोई अंतर नहीं रहता, अर्थात् उसने अपने आपको भृंगी में फ़ना कर लिया और एकदम वैसा ही बन गया|
इसी बात पर एक दृष्टांत याद आ रहा है — एक महात्माजी थे, फ़कीर थे, घर में कोई सामान नहीं रखते थे| एक दिन उनके यहाँ मेहमान आ गए| उन्हें बड़ी फ़िक्र हुई, कुछ सोचते हुए घर से निकले, थोड़ी देर में एक आदमी जो हलवाई था, एक बहुत बढ़िया मचान(उस देश का पकवान) लेकर पहुंचा, और बोला मैंने आपके नाम की मिन्नत माँगी थी, सो नज़र है| महात्माजी (जिनका नाम सरखील सादकीन था) ने सर्वशक्तिमान को धन्यवाद दिया खुद भी खाए औरों को भी खिलाये| थोड़ी फुर्सत मिलते ही उस हलवाई से बोले देखो आज तो तुमने मेरी लाज रख ली, वक़्त पर खाना लाकर, तुम्हारी कोई मुराद हो तो कहो|
वह बोला –मैं आप जैसा हो जाऊँ| वे सुनते ही सोच में पड़ गए| थोड़ी देर चुप बैठे रहे फिर बोले – यह बड़ा कठिन काम बताया तुमने, इसे सहन करना, तुम्हारे लिए बहुत कठिन होगा, तुम्हारे ऊपर बहुत बोझ पड़ेगा| कहने लगा यह तो मेरी मुराद थी, अब आगे आपकी मर्ज़ी| वचन दे दिया था, मजबूर होकर एक कमरे में ले गए और किवाड़ बंद कर दिए, उसे अपने सामने बिठा लिया| देखिये! यह जो परिवर्तन उसमे किया गया,वह भी संगति से ही हुआ| हलवाई के सारे परमाणु (आतंरिक और बाह्य) बदल डाले| संगति का ऐसा प्रभाव कि दोनों में से कौन सरखील सादकीन और कौन हलवाई कोई पहिचान ही नहीं सकता था|

Comments to: संगति

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Attach images - Only PNG, JPG, JPEG and GIF are supported.