परोपकार करते समय मन में ऐसी भावना लाना कि इससे मुझे यश मिलेगा, प्रतिष्ठा बढ़ेगी, या आगे चल के धन हाथ आएगा, परोपकार नहीं पाखण्ड है| ऐसा व्यक्ति परोपकार की आड़ में अपना स्वार्थ साधना चाहता है |परोपकारी-जीवन बनाए बिना, हम उस सर्वशक्तिमान की दया के पात्र भी तो नहीं बन सकते, परन्तु परोपकार नि:स्वार्थ होना चाहिये| सेवकाई से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं| यह सेवा भी कई प्रकार की है—शरीर की, विद्या की, धन की,मन की और आत्मा की|

जैसे– अधिक धन कमाया और अपने परिवार के साथ-साथ निर्धनों को भी सुख पहुंचाया| खूब विद्या ग्रहण की और निर्धनों को free में पढ़ाया, Doctor बने और गरीबों की free treatment कर दी, free medicines बांट दीं इत्यादि| ये सब नि:स्वार्थ सेवा ही तो है |

इस पर एक दृष्टांत याद आ रहा है — एक सेठ के पास बहुत धन था, वह एक महात्मा जी के पास गया और बोला—मेरे आगे-पीछे मेरा अपना कोई भी नहीं है तो, इस अपार धन राशि का मैं क्या करूंगा? आप ही इस धन का कोई सदुपयोग करें, उनने कहा मुझे मत उलझाओ इसमें, तुम्ही किसी अच्छे कार्य में इस धन को लगाओ| परन्तु एक बात का ध्यान रहे कि इस धन का उपयोग तुम जिस किसी भी कार्य में करो, वह काम सबके भले के लिए हो| यह नहीं कि किसी एक सम्प्रदाय, किसी एक जाति विशेष या किसी धर्म विशेष के लिए हो | जो भी काम करो वह सबके भले के लिए हो|

कुछ दिनों बाद वे महात्माजी वहां से चले गए| सेठ इस विषय पर बहुत गहराई से सोचने लगा| अगर मैं एक मंदिर बनवाता हूँ तो क्या होगा? क्या वह सभी के लिए अर्थात् सारी मानव जाति के लिए उपयोगी होगा? बहुत ध्यान से सोचा तो पता चला कि इसमें सिर्फ एक ही सम्प्रदाय के लोग जा सकेंगे, तो उसने सोचा, एक धर्मशाला बनवा दूंगा | लोग तो आएंगे परन्तु सभी धर्म के लोग तो नहीं आ पाएंगे|

फिर धर्म शाला की बात भी नहीं जमी उसे| फिर सोचा चलो एक स्कूल बनवा दिया जाए| उसने खूब सोच कर देखा| अबकी बार उसने सोचा अब क्या करूँ ? उस समय उस सेठ को फिर महात्मा की आज्ञा याद आयी| उसने वहां एक अस्पताल बनवादी| जिसमे सब लोग समान रूप से आने लगे|

उस राज्य के राजा ने सेठ को बुलवाया और पूछा कि इतना अच्छा कार्य करने का क्या कारण है ?

सेठ ने बताया कि मैंने एक महात्माजी से सलाह ली कि मेरे पास अपार धन है ,परन्तु उसका उपभोग करने के लिए मेरे पास संतान नहीं है, उनने कहा कि अपने धन का उपयोग उसमे करो जिसमे सबका भला हो|

मैंने सोचा कि अस्पताल बन गया तो यहां सबका भला होगा, बिना किसी जाति सम्प्रदाय के भेदभाव के सारी मानव जाति को सेवा देने वाले व लेने वाले भी सामान रूप से मिल जाएँगे|

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