लगभग सभी बच्चों के मन में पांच- छ: वर्ष की उम्र से कम से कम 15 -16 वर्ष की उम्र तक अपने पिताजी के लिये यह भाव रहता है कि मेरे पिताजी जितना शक्तिशाली दूसरा कोई नहीं है। उनके पास प्रत्येक प्रश्न का उत्तर होता है वो सब कुछ जानते हैं। संतान के सुपर हीरो तो पापा ही होते हैं। किंतु हमारी आयु बढने की साथ – साथ ये भावना समाप्त हो जाती है । हमारा अहंकार बढने लगता है और हम अपने को ही बलवान और बुध्धिमान समझने लगते हैं। इसी संबंध में आज ही एक लघु कथा मैंने पढा एक साधारण परिस्थिति का पिता, जिसने पुत्र को बहुत कष्ट उठाकर उच्च शिक्षा दिलवाई। उसका वह पुत्र बहुत बडे पद पर कार्य करने लगा । एक दिन पिता पुत्र के बचपन की मीठी यादों मे खोया, पुत्र के पास आया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा कि बेटा बताओ कि सुपर हीरो कौन है? बेटा बोला पिताजी ! निश्चित ही सुपर हीरो तो मैं ही हूं । किंतु पिता को इस उत्तर की आशा नहीं थी । पिता ने सोचा कि बेटा आज भी यही कहेगा कि पिताजी आप सुपर हीरो हैं किंतु … पिता कमरे से बाहर जाते – जाते फिर रुके और मुडकर फिर वही प्रश्न किया । इस बार बेटे ने कहा  पिताजी ! सुपर हीरो तो आप ही हैं । पिता ने कहा अरे ये क्या ? अभी तुमने कहा कि सुपर हीरो तुम हो और एक पल में फिर अपना उत्तर बदल दिया ! बेटे ने कहा पिताजी जब आपने पहली बार पूछा था तब आपका हाथ मेरे सिर पर था और जिस पुत्र के सिर पर पिता का हाथ हो  वास्तव में जीवन में वही सुपर हीरो है । अब जब आप ने दूर खडे होकर पूछा तो उत्तर वही जो बचपन का था । पिता की आंखें भावावेश में छलछला आई । दौडकर पुत्र को गले से लगा लिया और बोले बेटे तुझ सा पुत्र पाकर मैं धन्य हुआ । मेरा हाथ तो सदा तेरे सिर पर ही रहते हैं । ये आवश्यक नहीं कि वो प्रत्येक समय प्रत्यक्ष दिखें । वास्तव में तू ही मेरा सुपर हीरो  है । आज हमें ये जानना बहुत ही आवश्यक है कि हमारे जीवन की सफलता और उन्नति का मूल मंत्र यही है कि हम अपने माता – पिता को भरपूर प्यार और सम्मान देकर सदा इस बात का ध्यान रखें कि किन्हीं भी परिस्थितियों में  उन के दिल को ठेस न लगने दें। तभी उनका सम्पूर्ण आशीर्वाद हमें सुपर हीरो बनाता है जिसका सर्टिफिकेट भी वही देते हैं।

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