हम सब छोटी कक्षाओं में कवि रैदास की कविताएँ पड़ीं वे जाती के चमार थे | जूते बनाकर बेचते थे , और अपनी गृहस्थी का पालन पोषण करतें थे | वे भिक्षा मागना पसंद नही करतें थे और यदि कोई उन्हें कोई वस्तु free में दे दे तो वे घृणा करतें थे और छप्पर पर डाल देते थे | उसी झोपडी में उनकी दुकान चलती, उसी में सत्संग होता | इतनी गरीबी थी की पैसे आ गए तो बच्चों ने रोटी खाई, अन्यथा भूखे ही सो गए | एक बार एक साधु उनके पास आए और वे रैदास जी की गरीबी देख कर बहुत दु;खी हुए और जब लौटने लगे तो बोले आप बाल बच्चे दार है, घर गृहस्थी में पैसो की जरुरत तो पड़ती ही है | मेरे पास पारस पत्थर है इसे आप रख लें और अपना काम चलाएँ | रैदास जी बोले मैं तो मेहनत की कमाई ही पसंद करता हु जिससे विचार अच्छे बने रहतें हैं | और बरकत भी होती है और सभी प्रसन्न भी रहतें हैं | मुझे इसकी जरूरत नही ईश्वर जो दे दे रुखी सुखी वही ठीक | कितनी ही कोशिश की परंतु वे नही माने | तो रैदास जी बोले तो आप छापर पर खोंस दो | एक वर्ष बाद वे साधू फिर लौटे कर आते-आते सोचने लगे कि अब तक रैदास बहुत आमिर हो गए होंगे , सोने का महल होगा | परंतु वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि वे तो उसी पुरानी झोपडी में हैं और वैसे ही जूते बना रहे हैं | उन्होंने पूछा पारस कहाँ हैं | वे बोले आप जहाँ रख गए होंगे वही होगा | वह मेरे तो किसी काम का ही नही | आप अपनी चीज वापस ले जाइए | किसी की कीमती वस्तु को देखकर न ललचाना, देने पर भी, आग्रह करने पर भी स्वीकार न करना | यह तभी संभव होगा जब आप अपने मन पर राज्य करें | यही त्याग की पराकाष्ठा हैं |

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