उजाले की ओर

यदि हम किसी राह पर आगे बढ़ना चाहते हों, और उस राह पर प्रकाश न हो तो हमें कदम कदम पर डर लगने लगता है, तरह-तरह के विचार आने लगते हैं कि कहीं ऐसा हुआ तो? कहीं वैसा हुआ तो? इसके विपरीत यदि पूरे आर्ग में उजाला हो तो हम बड़े ही निडर होकर बिना किसी शंका संशय के आगे बढ़ते चले जाते हैं और यदि उजाले के साथ-साथ कोई मार्ग दर्शक भी मिल जाये तो सोने में सुहागा ही है समझो|

हम अगर और दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह उपकारी कौन है? चाहे किसी जाति  संप्रदाय धर्म को माननेवाला हो|

हम राहगीर तो तहेदिल से उसे दुआएं ही देंगे जिसकी कृपा से हमारा मार्ग सुलभ हो गया|

दीपक का काम तो उजाला देना है| जिस जगह जिस वस्तु पर वह अपना प्रकाश डाले वह वस्तु हमें उतनी साफ़-साफ़ दिखाई देगी चाहे उसकी सुन्दरता हो या उसकी बदसूरती ही क्यों न हो|

इसीलिए बड़े बड़े महर्षियों ने परमात्मा से प्रार्थना की कि हमें अन्धकार से उजाले की ओर ले चलो जिससे सही लक्ष्य की और हम बढ़ सकें| इसके विपरीत यदि उजाला ही न हो तो क्या हो?

इसी बात पर एक कहानी यद् आ रही है — एक महात्माजी एक गाँव में पहुंचे| एक सेठ ने कहा कि मेरे पास एक बड़ा सा बंगला है जिसमे सारी सुख सुविधाएं है| सोफासेट, fan, bed इत्यादि| परन्तु क्या हुआ कि अँधेरा हो चुका था और बिजली न होने के कारण, उजाले का अभाव और कमरे में प्रवेश करते ही हाथ पाँव में ठोकर लग गई| जैसे ही बिजली आई तो उजाले में सारी सुख-सुविधा की सामग्री दिख गई और सुख ही सुख|

इस कहानी से भी यही पता चलता है कि  इसी प्रकार अपने लक्ष्य के मार्ग पर चलना, मंजिल तक पहुंचना और उस दरबार में बने रहना कोई आसान काम नहीं| एक महात्माजी कहते हैं—मेरे मार्ग दर्शक ने मुझे

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राजमार्ग पर लाकर खड़ा कर दिया परन्तु मुझे काम करने के लिए कभी भी अकेला न छोड़ा| मेरे अँधेरे और अपवित्र दिल में स्थान ग्रहण कर लिया और हर वक़्त मेरे साथ ही रहे अपनी कृपा से मेरी बाहरी और भीतरी देख-रेख की| बस बात इतनी सी  है कि हमें हमेशा उनका दामन थामे रहना है|

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