आज मेरे बेटी की कुछ Friends मेरे घर पर आये, कुछ देर मैने भी उन सब से बात किया। आखिर मेरे पास उनसे बात करने का Topic ही क्या था! बस वही – बच्चों ! आगे क्या करना चाह रहे हो ? भविष्य का क्या प्लान बनाया है इत्यादि । उन के उत्तर कुछ इस प्रकार थे । मै तो degree होते ही IAS  का exam दूंगी। मुझे तो रौब दार नौकरी करनी है। एक ने कहा मै तो Maths, Phy. Che. के लिये coaching centre  खोलूंगा । 40 -50 हजार महीने की आराम से कमा लूंगा। एक बेटी बोली – मै तो किसी अमीर लडके से शादी कर के आराम से जिन्दगी बिताउंगी, बहुत गरीबी देख ली। तो एक लडके ने कहा – मुझे business  करके करोडपति बनना है।             इन सब की बातें सुनकर मै सोचने लगा कि आखिर आज समाज की नजरों में उन्नति का पैमाना क्या है? वैसे तो जो BA की degree करने तक पापा के पैसे खर्च कर रहा था, आज ice cream candy बेच कर दिन के 100 रुपये कमाने लगे तो भी तो उन्नति ही हुई ! क्यों कि ऐसा नहीं कि वह जीवन भर 100 रुपये प्रतिदिन ही कमायेगा । उन्नति तो उत्तरोत्तर होती है। आगे वह कोई दूसरा business कर सकता है, किंतु आज का समय इसे उन्नति नहीं मानता । कारण यह है कि हमारी आदत पड गयी है शिखर को ही देखना और  देखकर सीधे jump लगाने की सोचना । आप देखें कि आज जो उन्नति के शिखर पर हैं उन में से कई लोगों ने बहुत छोटे- छोटे काम किया – जैसे चाय बेचना, Petrol Pump पर काम करना इत्यादि।

समस्या कहां है ? – वो है हमारी सोच में । कोई काम  छोटा  या बडा नहीं होता। आवश्यकता होती है काम में लगन की, ईमानदारी की और उत्तरोत्तर  उन्नति की प्रबल इच्छा । एक और important बात  यह है कि जिस शिखर पहुंचना,  सबकी नजरों मे  उन्नति है, उस के लिये ये जानना अतिआवश्यक है कि  चलना किस point से आरंभ किया गया ! एक ठीक शिखर के नीचे खडा है और वहीं से चलना शुरू कर देता है। कोई शिखर से 1 किलोमीटर दूर है तो कोई 10 किलोमीटर तो कोई 100 किलोमीटर। निश्चित ही इन सब को लगने वाला समय और परिश्रम भी अलग-अलग ही होगा। तात्पर्य यह कि जिस परिवार में मम्मी- पापा IAS हैं, या बहुत बडे business man हैं उनकी संतान का IAS बन जाना या और बडा business man बन जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। वो तो शिखर के ठीक नीचे खडा है। किंतु एक मजदूर या ठेले पर चाय या सब्जी बेचने वाले का बेटा बहुत बडा Officer  बन जाये या एक बडा  business man बन जाये तो बात आश्चर्य की है। क्योंकि उसने  तो शिखर से 100 किलोमीटर की दूरी से चलना शुरू किया । समाज भी यही कहता है कि बेटे ने कितनी उन्नति की!

किंतु मेरी नजर मे वास्तव में उन्नति बेटे ने नहीं, बल्कि उस के पिता ने  की । क्योंकि उस पिता ने काम को छोटा नहीं समझा। लगन और ईमानदारी से अपना काम किया । बेटे को पढाई की सुविधा दी, माहौल दिया, संस्कार दिया । और उस पिता की मेहनत, लगन के कारण ही एक दिन वो पिता उन्नति के शिखर पर जा पहुंचता है जहां उसका पुत्र अपने मां-पिता को ही भगवान मानकर उनकी सेवा करता है।

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