एक बार एक मालिक और नौकर चार ऊंठ लेकर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश जा रहे थे । वे लोग जंगल के रास्ते से होते हुए एक गांव के निकट पहुंचे, शाम भी ढल चुकी थी, तब एक स्थान पर रात विश्राम करने के विचार से रुक गये। मालिक ने नौकर से कहा कि ऊंठों को किसी पेड से बांध दो वरना ये चरते हुए कहीं भी चले जायेंगे। नौकर ने ऊंठ को बांधने वाली रस्सियां निकाली और एक-एक करके  ऊंठ को पेड से बांधने लगा। जब उसने तीन ऊंठों को बांघ लिया, तो देखा कि चौथे ऊंठ के लिये उसके पास रस्सी नहीं थी। उसने मालिक को बताया तो मालिक ने कहा तुम चौथे को बिना रस्सी के ही वैसे ही बांधने की Acting करो जैसे कि तुमने तीन ऊंठों को बांधा है । नौकर ने पूछा कि मालिक ये क्या बात हुई । मालिक ने कहा कि पहले जो बोला है वह करो फिर बताउंगा । नौकर ने वही किया और वे दोनों खाना खाकर सो गये। जब सुबह वे लोग उठे तो नौकर यह देखकर आश्चर्य में पड गया कि जिस ऊंठ को रस्सी से नहीं बांधा था वह भी तीन ऊंठ की तरह ही अपने स्थान से नहीं हटा । खैर ! जब वे लोग अपनी आगे की यात्रा के लिये चलने को हुऐ तो मालिक ने कहा कि ऊंठों को बंधन खोल दो । नौकर ने तीन ऊंठों के बंधन खोल दिया क्योंकि चौथे को तो खोलने की जरूरत ही नहीं थी क्यों कि उसे तो बांधा ही नहीं गया था । किंतु नौकर ने देखा कि चौथा अपने स्थान से हिला भी नहीं । नौकर ने फिर मालिक से पूछा कि ये चौथे को क्या हुआ?  ये अपने स्थान से हिलता क्यों नहीं ? मालिक ने पूछा कि तुमने उसे खोला के नहीं? नौकर ने कहा कि मालिक ! वो तो मैंनें केवल बांधने की Acting की थी । मालिक ने कहा बेटा ! अब जैसे तीन ऊंठों को खोला है, ठीक उसी तरह इसके बंधन को भी खोलने की Acting करो । नौकर ने आज्ञा का पालन किया तो देखा कि ऊंठ तत्काल ही आगे को चल दिया । नौकर को ये Acting कुछ समझ में नहीं आयी । उसने फिर मालिक से पूछा मालिक इस Acting का रहस्य तो बताओ ! तब मालिक ने कहा बेटा ! चौथे ने पहले तीन को बंधते हुए देखा किंतु वह अपने गले में रस्सी  है या नहीं, यह नहीं देखता। वह तो तुम्हारी Acting को यथार्थ मानकर स्वयं को बंधन में महसूस करता है । इसलिये जिस तरह बांधा था, उसी तरह खोलना भी पडा ।

संसार में प्रत्येक मनुष्य की यही मानसिक दशा है । क्योंकि हमारे मन ने यह मान लिया है कि हम बंधन में हैं, इसलिये खूब पुण्य कमाकर, खूब पूजा करके मुक्त होने की सोचते हैं । सच्चे महापुरुष इस बात को जानते है कि ये बंधन वास्तविक नहीं बल्कि Virtual है यानी आभासी बंधन है। ये बंधन तो मन पर है । भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीमद्भग्वत गीता में अर्जुन को यही बताया है कि “ मुक्ति और बंधन का कारण केवल मन ही है।“

जब हमारे मन में इस संसार सागर से मुक्त होने की बलवती जिज्ञासा होती है तो हम किसी सच्चे महापुरुष की तलाश करते हैं । वह इसलिये कि हम सब इस बात को भली प्रकार जानते हैं कि जो स्वयं बंधन में है, वह दूसरों के बंधन खोल नहीं सकता । सच्चे महापुरुष किसी बंधन में नहीं होते इसलिये हमारी इस आभासी बंधन को खोलने में केवल वे ही समर्थ होते हैं। उनकी शरण जाने पर वे हमारे अनंत जन्मों से बंधन में जकडे हुए मन को मुक्त करते हैं । ऐसे समर्थ गुरु की कृपा से ये मुक्ति हम जीवन रहते हुए, इसी जीवन में प्राप्त करते हैं । मृत्यु के बाद की मुक्ति की किसे खबर ? और कौन बताये?

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