आपत्ति काल में मर्यादा नहीं है —लोग इस प्रकार से कहकर, करने न करने योग्य काम किया करते हैं,और हर समय आपत्तियों की कथित आड़ में स्वार्थ को साधा करते हैं|
इसी बात पर मुझे एक दृष्टांत याद आ रहा है| एक महात्माजी थे जिनका नाम उषस्ति था उनके कई शिष्य थे| वे अपने शिष्यों सहित सरस्वती नदी के किनारे आश्रम में रहते थे| एक बार बाढ़ के कारण बड़ी ही विकट स्थिति उत्पन्न हो गई, जिसकी वजह से सभी भूख से व्याकुल हो गए, भोजन की कोई व्यवस्था न हो पा रही थी, इसीलिये सारे शिष्य वहां से चले गए| उषस्ति और उनकी नव विवाहिता पत्नी जो कष्ट क्या होता है से अपरिचित थी ही रह गए थे| इसी कारण उषस्ति ने उस स्थान को छोड़ने का सोचा|, वे पति-पत्नी कौशल की ओर रवाना हुए| दोनों की हालत ऐसी हो गई कि अब भूख के मारे प्राण ही निकल जायेंगे|
इतने में उनने देखा कि कुछ लोग उसी तरफ बढ़ रहे हैं जिस वृक्ष के नीचे वे विश्राम कर रहे थे| जिनने सोचा कि अब कुछ खा लिया जाय| उनके पास भोजन देख उषस्ति ने सोचा कि पत्नी की जान बचाने के लिए इन्हीं से कुछ मांग लेता हूँ, और उनसे याचना की कि मेरी पत्नी की जान बचाने के लिए कुछ खाने को दे दीजिये, ऐसा सिर जो कभी किसी महाराजा के समक्ष भी न झुका हो, उन विद्वान् पुरुष की ये हालत देखकर,पथिकों ने बचा हुआ अन्न दे दिया| परन्तु उषस्ति की हालत तो खराब होती ही जा रही थी,और वे आगे चलते ही जा रहे थे कि अगले गाँव में कुछ भोजन इन्हें भी नसीब हो जायेगा|
वे महावतों की बस्ती में पहुंचे, उस महावत को चार-पांच दिनों बाद कुछ उड़द मिल पाया था जिसे वह पकाकर खा रहा था| थाली में अब थोड़े से ही उड़द बचे थे| इतने में उषस्ति वहां पहुंचे| उन्हें सामने देख उसने खाना बंद कर दिया और बोला महाराज! आज मैं बड़ी मुसीबत में हूँ, मेरे यहाँ एक अन्न का दाना भी नहीं है कि मैं आपका सत्कार कर सकूं| यही झूठे उड़द मेरी थाली में रह गए जिसे कि मैं आपको नहीं दे सकता|
परन्तु मारे भूख के उषस्ति के प्राण निकलने की स्थिति में थे| अतः उनने कहा कोई बात नहीं मैं झूठा भी खाने को तैयार हूँ| इसपर उसने कहा कि आप एक श्रेष्ठ ब्राह्मण ,महात्मा ,मैं आपको अपना झूठा खिलाकर अपने दोनों ही लोक बिगाड़ लूँगा| अतः यह असंभव है| उनने request किया कि please तुम मुझे उपदेश न दो| तुम्हारे झूठे अन्न से मेरे प्राण बच जायेंगे अतः तुम्हे पाप नहीं बल्कि पुण्य मिलेगा|
इसपर महावत ने झूठी थाली और पानी का लोटा उनकी ओर सरका दिया| क्षण भर में उनने थाली साफ़ कर दी, उनकी जान में जान आई| फिर उषस्ति ने पीने के लिए जल माँगा|
महावत ने लोटे की ओर इशारा किया| परन्तु उषस्ति ने कहा- यह तो तुम्हारा झूठा जल है | मैं झूठा जल पियूंगा?
महावत आश्चर्य में डूबने लगा, और आखिर पूछ ही लिया –“महाराज! आपने मेरे झूठे उड़द तो खा लिए और झूठे जल के लिए मना कर रहे हैं?” यह कैसा धर्म?
उषस्ति ने समझाया—“यदि मैं तुम्हारे झूठे जल को भी पी लूं ,तो वह स्वेच्छाचार होगा, आपद धर्म नहीं| प्राणों को संकट में देखकर , जो कार्य किया जाता है, वह आपद धर्म कहलाता है| जल तो मुझे और भी मिल सकता है| इसके बिना मेरे प्राण नहीं निकल सकते, जीवन चल सकता है, उसकी प्राप्ति में स्वेच्छाचार करना अधर्म है ,पाप है| इससे लोक-परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं|”
इस रहस्य को सुनकर महावत ने सिर झुका लिया|

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