यदि किसी को अपना सर्वस्व मान लिया है, तो उसकी हर बात पर हमें पूर्ण विश्वास रखना होगा| जिस प्रकार एक छोटे बालक को हवा में बड़ी ऊंचाई पर उछाला जाता है तो वह जोर जोर से हँसता है, कारण यह कि उसे अपने पिता पर पूर्ण विश्वास होता है कि वे उसे गिरने न देंगे, सम्हालकर पकड़ लेंगे| वास्तव में विश्वास हो तो ऐसा होना चाहिए, न कि हम उनकी आज्ञा-पालन करते वक़्त सोचने लगें कि क्या इनकी आज्ञा का पालन करना हमारे लिए हितकारी होगा?
इसी बात पर मुझे एक दृष्टांत याद आ रहा है|
एक महात्मा जी थे| एक व्यक्ति उनसे प्रभावित होकर, उनका शिष्य बनना चाहता था | इसलिए उनकी सेवा में हमेशा तत्पर रहने लगा| दोनों में करीबी बढ़ी और वह व्यक्ति उन्हीं के आश्रम में रहने लग गया| इस व्यक्ति का नाम था मन्मथ और जिन्हें इसने अपना गुरु माना उनका नाम था आत्मबोध| मन्मथ में गुरु के प्रति प्रेम भरा था और गुरु की सेवा ही वह अपना धर्म समझता था| थोड़े ही समय में उसने अपने गुरु की सारी जरूरतों को समझ लिया, फलस्वरूप यह हुआ कि गुरु के बिना कहे ही उनकी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति कर देता| उसे एक ब्रह्मनिष्ठ और आत्मवेत्ता के संग रहने का सुअवसर प्राप्त हुआ |एक साधक के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है? इससे साधक बहिर्मुखी से अंतर्मुखी हो जाता है,ऐसी स्थिति में जब वह प्रेम विभोर हो जाता है तो गुरु की सारी शक्तियां और ज्ञान उसमे उतर आता है, परन्तु मन और मानवी बुद्धि ने मन्मथ को ऐसा धकेला कि पूछो मत| उसकी तो बड़ी ही दयनीय स्थिति हो गई|
गुरु ने जब शिष्य को परखना चाहा तो वह उसमे फेल हो गया, इसका कारण उसकी मानवी बुद्धि|
महात्माजी जहाँ सोते थे वहां एक मिटटी के घड़े में जल भरकर रखते थे रात्रि में जब नींद खुल जाए तो उठकर मुँह धोकर आचमन कर शेष रात ईश्वर ध्यान में बिता देते थे| सर्दियों का मौसम, उसमे भी माघ का महीना| जानबूझकर मटका बाहर छोड़ दिए और नींद से जागने पर मन्मथ को आवाज़ लगाई कि देखो मटका कहाँ है बड़ी प्यास लगी है| उसने देखा और कहा कि कमरे में तो नहीं है| महात्माजी बोले लगता है कि बाहर आँगन में रहा गया है ले आओ, मुझे बड़े जोर की प्यास लगी है| मन्मथ जल पिलाने को तैयार न हुआ बोला एक तो आप अत्यंत वृद्ध और कमजोर है, यह बर्फीला ठंडा पानी आपको नुकसान पहुंचाएगा, यह काम मुझसे न होगा| वे फिर से बोले बड़ी प्यास लगी पानी पिलादे, इसपर वह बोला आप तो सात-सात दिन तक निर्जल उपवास कर लेते हैं, थोड़ा धीरज रखें, सुबह होते ही ताज़ा जल ले आऊँगा| यह सुन वे चुप रह गए और मन्मथ भी सो गया|
महात्माजी ब्रह्म मुहूर्त में उठकर प्रातःकालीन भ्रमण पर जाने लगे| मन्मथ भी उनके साथ जाने लगा|
एक दिन माघ के महीने में महात्माजी टहलते-टहलते एक बर्फ की चोटी पर चढ़ते गए| वे मन्मथ से उम्र में दुगुने थे परन्तु बड़ी ही आसानी से चढ़ गए, हाँफते हुए मन्मथ भी चढ़ ही गया| सूर्योदय के वक़्त उनदोनों ने एक अत्यंत बूढ़े व्यक्ति को देखा जो इतना दुबला था कि उसकी -पसलियाँ गिन लो, अपने वस्त्र उतारे और वहीं एक पत्थर मारा और एक गोल छेद बन गया वे उसमे उतरे और स्नान किया, बाहर आकर पूजन किया तब इन लोगों ने उनसे प्रश्न किया — ऐसी ठण्ड में स्नान का कारण क्या? दूसरा प्रश्न था कि ये ठण्ड क्या आपके फेंफडों को हानि नहीं पहुंचाएगी? गुरु आदेश कभी भी हानिकारक नहीं होता|
यह बात सुनकर वे अपने आश्रम लौट गए| कुछ दिनों बाद आत्मबोधजी ने मन्मथ को वह बात याद दिलाई कितना विचित्र आदमी था| बिना कुछ सोचे ही कैसे गुरु आज्ञा का पालन कर रहा था, महात्माजी यह बात क्यों कह रहे होंगे वह न सोच पाया और इस बात का उसपर कोई असर न पडा, तब आत्मबोध जी बोले एक तुम थे जिसने मेरी आज्ञा का पालन न कर पूरी रात मुझे प्यासा रखा| जिद्दी मन्मथ अब भी वही बात दोहरा रहा था कि एकदम ठन्डे बर्फीले पानी को पिलाकर मैं आपका स्वास्थ्य कैसे बिगाड़ सकता था ? इतनी बातों के बाद भी मन्मथ का विवेक न जागा| उसे अपनी की हुई गलती का आभास न हुआ| उसकी बुद्धि यह बात स्वीकार न कर सकी कि गुरु आज्ञा हमेशा शुभ और मंगलकारी ही होती है|
आखिर परेशान होकर कि प्रत्यक्ष उदाहरण दिखाने पर भी कि, गुरु- आज्ञा का पालन कैसे किया जाता है , यह मूर्ख समझ नहीं रहा है और तो और आज भी अपनी ही बात पर अडा हुआ है कि उसने जो भी किया वह सही था | गुरु आज्ञा- पालन के महत्व को नहीं समझ पा रहा है\ उसके विचार में जो सही है वही बोले जा रहा है| तब महात्माजी ने उसे बुलाकर पूछा—तेरा मेरा क्या सम्बन्ध? वह बोला आप मेरे गुरु हैं| उनने कहा जा तू मेरे कामका नहीं है, जाकर अभी और तपस्या कर|
जो अपने सर्वस्व की ही आज्ञापालन न कर सके अर्थात् उनकी बातों पर विश्वास न ला सके तो ऐसा व्यक्ति किस पर विश्वास करेगा?

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