कल शाम जब मैं अपनी सखी प्रज्ञा से मिलने गई, तो देखा कि वह तो बड़ी ही उदास सी बैठी हुई थी| अरे प्रज्ञा क्या हुआ? वह बोली भाभी देखिये न! आज तो मन बड़ा ही उदास सहो रहा है|अच्चा तो बताओ तुम्हारी अशांति का कारण क्या है? वह बोली मुझे तो लगता है कि मेरी इच्छाएँ ही मेरी अशांति का कारण हैं| एक इच्छा पूरी होती है की नहीं दूसरी उठ कड़ी होती है| ये सिलसिला कहीं ख़त्म ही नहीं होती है|

“न इच्छा हो ,न अशांति हो”
मुझेअचानक मेरे ताऊजी की बात याद आ गई| वे कहते थे कि- याद रखो शांति और अशांति दोनों आप ही के अन्दर हैं| कोई भी वस्तु तुम्हें बाहर से लानी नहीं है| तुम जब चाहो शांत हो सकते हो और जब चाहो चंचल और प्रसन्न| परन्तु इसकी एक विधि है| तुम जिसे भूल चुके हो| जैसे तुम्हारे पास से अपने सुन्दर कमरे की चाबी खो जाय, जिसके अन्दर सब आनंद की वस्तुएं थीं,उसे ढूँढने में लगे हो और अब ऐसे व्यग्र हो गए हो उसका भी पतानहीं|
कई लोग इच्छा को ही दुःख का कारण मानते हैं,परन्तु इच्छा दुःख का कारण नहीं है| जो इच्छा नहीं करेगातो सुख भी तो नहीं पायेगा| शुभ इच्छाओं से शुभ कार्य होंगे और प्रसन्नता प्रदान करेंगे|
फिर उन्होंने इसी बात को समझाने के लिए एक कहानी सुनाई|एक राजा ने बड़ी तपस्या की| भगवान प्रसन्न हुए, पूछा कि क्या चाहते हो? कहने लगा, प्रभु मुझे कोई इच्छा न हो|भगवान् ने कहा -“ऐसा ही होगा”| अब उसे कोई भी इच्छा ही नहीं होती| न कुछ खाने की न बच्चों से खेलकर आनंदित होने की| अब तो राजा और भी परेशान हो गया| तब रानी ने पूछा कि क्या बात है राजा? तो राजा ने सारा हाल सुनाया और कहा कि अब तो मुझे कोई भी इच्छा नहीं हो रही है| घुटन सी महसूस हो रही है|अरे राजाजी! जब आपको बहुत इच्छाएँ थीं तब भी आप अशांत थे, आज इच्छाएँ नहीं हैं,तब भी आप अशांत हैं| आप इच्छाओं के फेरे में मत पड़िए| जीवन में शांति और आनंद के वास्ते, पृथक आप अपने अन्दर विवेक को जाग्रत करें|आपके अंतर में सब कुछ रखा हुआ है,परन्तु आप अनभिज्ञ हैं| उसी को समझने के लिए ” विवेक “ की आवश्यकता है| इच्छाओं को अपने वश में करने की आवश्यकता है|
इसी में सुख है इसी में शांति|अपने पर पूर्ण अधिकार| विवेक बतावेगा कि कैसी इच्छा हो कैसी न हो, किसकी पूर्ती करनी है,किसकी नहीं| जब आपका विवेक जाग्रत होगा तब आपका राज्य अपने पर होगा| जिसने मन को जीत लिया उसने संपूर्ण विश्व जीत लिया| इसलिए विवेक द्वारा अपने मन पर अधिकार कर लो|

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